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निजी विद्यालय झूठे विज्ञापन छपवाकर बच्चों व अभिभावकों को करते हैं आकर्षित, हकीकत कोसों परे

सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट | June 10, 2018 07:24 PM
सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट

स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए निजी विद्यालय भी विज्ञापनों की चकाचौंध से बच नहीं पा रहे हैं
निजी विद्यालय झूठे विज्ञापन छपवाकर बच्चों व अभिभावकों को करते हैं आकर्षित, हकीकत कोसों परे


सतनाली मंडी (प्रिंस लांबा)।

 

सूचना एवं तकनीक के युग में विज्ञापन हमारे जीवन के अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं, इसके प्रभाव से बच पाना हम सभी के लिए काफी मुश्किल-सा हो गया है। आज समाज का हर तबका चाहे बच्चे हों या फिर बुजुर्ग, कामकाजी महिलाएं हों या गृहणी। सभी पर विज्ञापनों का प्रभाव देखा जा सकता है। विज्ञापन हमारे जीवन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। हमारा खान-पान, रहन-सहन सब कुछ विज्ञापनों से प्रभावित हो रहा है, यहां तक कि हमारे सोचने और व्यवहार के तरीके में भी विज्ञापनों की झलक साफ नजर आने लगी है। हम यह भी कह सकते हैं कि विज्ञापन समाज के दर्पण है- जिस प्रकार का समाज होगा, विज्ञापन की कॉपी तैयार करते समय इसके संवाद, चित्र, विज्ञापित उत्पाद आदि उसी प्रकार के होंगे। यह कह पाना काफी कठिन है कि समाज की छाप विज्ञापनों में नजर आती है कि विज्ञापनों की छाप समाज में दिखायी दे रही है। आम उपभोक्ताओं को यह जानना जरूरी है कि विज्ञापन क्या होते हैं, ये हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं और कब ये विज्ञापन भ्रामक हो जाते हैं। साथ ही यह भी जानना चाहिए की इन भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम या नियंत्रण के लिए देश में कौन-कौन से कानून हैं।

विज्ञापन वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रचार माध्यम होते हैं, लेकिन जब विज्ञापनकर्ताओं द्वारा जानबूझ कर मिथ्या प्रचार किए जाते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता हैं, तब यह आपत्तिजनक हो जाता है। जब कोई उत्पादक अथवा विज्ञापनकर्ता किसी उत्पाद के बारे में कोई दावा करता है, तो उसको उसे सिद्ध भी करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता है तो इसे भ्रामक विज्ञापन माना जाएगा तथा देश के विभिन्न कानूनों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन अपने आप को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए निजी शिक्षण संस्थान भी विज्ञापनों की चकाचौंध से बच नहीं पा रह हैं।

निजी शिक्षण संस्थान पब्लिसिटी के लिए झूठे विज्ञापन देकर बच्चों के अभिभावकों को आकर्षित करते हैं परंतु सच्चाई इनसे कोसों दूर है। आजकर हर क्षेत्र में किसी भी वस्तु की मांग को बढ़ाने में विज्ञापन की अहम भूमिका है। इसी को ट्रेंड मानकर आजकल निजी शिक्षण संस्थानों में स्वयं को अन्य से श्रेष्ठ बनाने की हौड़ लगी हुई है। मिथ्व्ययिता विज्ञापन देखने के बाद अभिभावकों को लगता है कि दिखाए गए विज्ञापन बिल्कुल उचित हैं।

वैसा देखा जाए तो ये निजी विद्यालय हर वर्ष टी.वी., अखबार आदि के माध्यम से व मैरिट में सही अंक पाने वाले विद्यार्थियों की बैनर में फोटो लगवाकर वाहवाही तो लूटते हैं परंतु हकीकत इनसे कोसों परे है। ये विद्यालय सच्चाई को छिपाते हुए कभी यह नहीं दर्शाते कि उनके विद्यालय में प्रत्येक वर्ष कितने बच्चे फैल होते हैं। इन विद्यालयों के संचालक इनते शातिर हैं कि विद्यालय के चुनीनंदा टॉपर बच्चों के बैनर या बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाकर अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। अभिभावक बेचारा बिना किसी जांच-पड़ताल इन स्कूलों के बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर व विज्ञापनों की चकाचौंध में फंसकर अपने बच्चों का दाखिला करवा देते हैं परंतु जब तक हकीकत सामने आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। बेचारा अभिभावक इन निजी विद्यालयों की असलियत जानकर स्वयं को ठगा-सा महसूस करता है।

इस बारे में ग्रामीणों का मत है कि अभिभावक अपने बच्चों का किसी भी निजी शिक्षण संस्थान में दाखिला करवाने से पहले उस विद्यालय की हकीकत से रूबरू हों तथा उस विद्यालय के बारे में विज्ञापन या बैनर आदि में दर्शाई गई सभी सुविधाओं के बारे में कजान लें ताकि बाद में पछताना न पड़े। आजकल तो यह आम हो गया है कि प्रत्येक निजी विद्यालय स्वयं को दूसरों से बेहतर दर्शाने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाता है तथा प्रत्येक विद्यालय द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ विज्ञापन की रैली बनाने की अंधी दौड़ में अभिभावकों की जेबों पर डाका लग रहा है। जब किसी भी विद्यालय के बारे में अच्छी तरह संतुष्टी हो जाए तभी अपने बच्चों का दाखिला वहां करवाएं ताकि विज्ञापन व बैनर के चक्कर में फंसकर बच्चों का भविष्य व व्यर्थ में धन बर्बाद न हो।

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