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Crime

एफआईआर दर्ज करवाते समय इन बातों पर जरूर दें ध्यान

July 03, 2018 06:35 PM
सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट

एफआईआर दर्ज करवाते समय इन बातों पर जरूर दें ध्यान
एफआईआर दर्ज करवाना आम नागरिक का मौलिक अधिकार: अधिवक्ता जिम्मी चौधरी


महेंद्रगढ़ (प्रिंस लांबा)।

 

कचहरी, अस्पताल और पुलिस स्टेशन, ये तीन ऐसे स्थान हैं जहां जीवन में एक बार ही सही हर आदमी का पाला कभी न कभी जरूर पड़ता है। पुलिस थाने का नाम सुनते ही पुलिस का भय लोगों के सामने आने लगता है। यहां तक कि आपने सुना होगा कि पुलिस ने दबाव बनाकर एफआईआर बदल दी है। पुलिस आम नागरिकों द्वारा कानून की कम जानकारी होने का फायदा उठाती है।

पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करवाने को लेकर जब जुडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट महेंद्रगढ़ के अधिवक्ता जिम्मी चौधरी से बात कि तो उन्होंने बताया कि किसी भी अपराध की रिपोर्ट पुलिस को दर्ज करवाने के लिए जैसे ही आप थाने में जाते हैं, तो आपको अपने साथ घटे अपराध की जानकारी देने को कहा जाता है। इसमें अपराध का समय, स्थान, मौके की स्थिति इत्यादि की जानकारी पूछी जाती है। पुलिस द्वारा यह सारी जानकारी डेली डायरी में लिखी जाती है जिसे रोजनामचा भी कहा जाता है। बहुत से अंजान लोग इसे ही एफआईआर समझ लेते हैं और अपनी तरफ से संतुष्ट हो जाते हैं। इसलिए जब भी अपराध की रिपोर्ट दर्ज करवाएं एफआईआर लिखवाएं और इसकी कॉपी स्वयं भी लें, यह आपका मौलिक अधिकार है। एफआईआर दर्ज करने में पुलिस द्वारा लापरवाही व देरी के लिए भी आप उस जिम्मेदार अधिकारी की शिकायत कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि एफआईआर की पहचान के लिए उस पर एफआईआर नंबर भी दर्ज होते हैं जिससे आगे इस नंबर से मामले में प्रक्रिया चलाई जा सके। आपको बता दें कि एफआईआर पंजीकृत करने के लिए किसी भी प्रकार की कोई फीस नहीं लगती है, यदि कोई पुलिस अधिकारी इसकी मांग करता है तो तुरंत उसकी शिकायत उच्च पुलिस अधिकारियों को करें। सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिकी यानि की एफआईआर दर्ज करने को अनिवार्य बनाने का फैसला दिया है। एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी न्यायालय ने दिया है। न्यायालय ने यह भी प्रावधान दिया है कि एफआईआर दर्ज होने के एक सप्ताह के अंदर प्राथमिक जांच पूरी की जानी चाहिए। इस जांच का मकसद मामले की पड़ताल और गंभीर अपराध है या नहीं जांचना है। इस तरह पुलिस इसलिए मामला दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती है कि शिकायत की सच्चाई पर उन्हें संदेह है।

एडवोकेट जिम्मी बताते हैं कि संज्ञेय अपराध के मामलों में तुरंत एफआईआर दर्ज करवाने के बाद उसकी कॉपी लेना शिकायकर्ता का मौलिक अधिकार बनता है। इसके लिए पुलिस द्वारा किसी भी सूरत में मना नहीं किया जा सकता। कोर्ट के आदेशानुसार संज्ञेय अपराध की एफआईआर में लिखे गए घटनाक्रम व अन्य जानकारी को शिकायकर्ता को पढक़र सुनाना भी अनिवार्य है। आप सहमत हैं, तो उस पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। वह बताते हैं कि यह जरूरी नहीं कि शिकायत दर्ज करवाने वाले व्यक्ति को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या फिर उसके सामने ही अपराध हुआ हो। एफआईआर में पुलिस अधिकारी स्वयं की ओर से कोई भी शब्द या टिप्पणी नहीं जोड़ सकता है। अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है, तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है। अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं, तो घबराने की जरुरत नहीं है। आपको पुलिस को सिर्फ देरी की वजह बतानी होती है।

उनका कहना है कि अगर पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज नहीं करें या आनाकानी करें तो आप अपनी शिकायत रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से उपायुक्त को भी भेज सकते हैं। उपायुक्त आपकी शिकायत पर कार्रवाई शुरू कर सकता है। इसके अलावा एफआईआर नहीं दर्ज किए जाने की स्थिति में आप अपने मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा-निर्देश के लिए कंप्लेंट पिटीशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के भीतर केस दर्ज कर आपको एफआईआर की कॉपी उपलब्ध करवाएं। मैजिस्ट्रेट के आदेश पर भी पुलिस अधिकारी समय पर शिकायत दर्ज नहीं करता है या फिर भी एफआईआर की कॉपी उपल्बध नहीं करवाता है तो उस स्थिति में अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और जेल भी हो सकती है।

 


फोटो कैप्शन: जुडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट महेंद्रगढ़ के अधिवक्ता जिम्मी चौधरी फाईल फोटो।

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