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इनेलो-बसपा गठबंधन पर अभी भी लगे हुए हैं कई सवालिया निशान

ईश्वर धामू | August 25, 2018 08:49 PM
ईश्वर धामू

इनेलो-बसपा गठबंधन पर अभी भी लगे हुए हैं कई सवालिया निशान


राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक दलों का महागठबंधन और इनेलो के तेजी से बदलते हालातों से प्रभावित होगा गठबंधन, बीस साल बाद दोबारा हुए इनेलो-बसपा

गठबंधन पर दोनो दलों के आम कार्यकर्ताओं का नहीं बन पा रहा विश्वास


(ईश्वर धामु) 


चंडीगढ़।  इनेलो का बसपा से राजनैतिक गठबंधन हुए चार महीने ही हुए हैं कि अभी से इस पर कयास लगाए जाने शुरू हो गए हैं। हर चर्चाकार इस गठबंधन को अपनी तरह से देखता है और सोचता है। क्योकि इनेलो का बसपा से 1998 में भी राजनैतिक गठबंधन हुआ था। दोनो दलों ने लोकसभा चुनाव साथ मिल कर लड़ा था। परन्तु विधानसभा में दोनेां दल अलग हो गए थे। उस समय कहा गया था कि कार्यकर्ता इस गठबंधन के हम में नहीं थे। इतना ही नहीं बसपा के तत्कालिन पदाधिकारियों का यह भी कहना था कि जंहा से इनेलो का प्रत्याशी मैदान में था, वहां बसपा कार्यकर्ताओं ने दिल से साथ दिया। परन्तु जंहा बसपा का प्रत्याशी चुनाव मैदान में था, उस क्षेत्र के इनेलो मतदाताओं ने मिल कर साथ नहीं दिया। जिसका परिणाम यह रहा कि परिणाम वांछित नहीं आए। अब करीब बीस साल बाद बदले राजनैतिक हालातों और बदली पार्टी परिस्थितियों में दोनों दलों का गठबंधन हुआ है। अब 2019 का चुनाव दोनों दल मिलकर लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ेेंगे। अभी दोनों दलों का सीटों पर अंतिम समझौता घोषित नहीं हुआ है। अभी यह भी तय नहीं है कि बहुमत आने पर प्रदेश का सीएम कौन बनेगा। परन्तु इनेलो ने पूरे जोर से प्रचारित किया हुआ है कि गठबंधन की सरकार बनती है तो ओम प्रकाश चौटाला सीएम होंगे। लेकिन बसना के समझदार कार्यकर्ता और पदाधिकारी इस मुद्दे पर चुपी साध जाते हैं। चर्चाकारों का कहना है कि कानूनी उलझनों के चलते ओम प्रकाश चौटाला का सीएम बनना अभी मुशकिल ही नजर आता है। अगर हालात यही रहे तो फिर मुख्यमंत्री अभय चौटाला ही होंगे। फिर एक यक्ष प्रश्र सामने आता है कि क्या पार्टी का अजय समर्थक कैडर अभय चौटाला को मुख्यमंत्री स्वीकार करेगा? इतना ही नहीं बसपा के आम कार्यकर्ता पर भी इस तरह की स्वीकृति पर अभी चुपी की मोहर लगी हुई है। इनेसो के स्थापना दिवस पर कैथल में हुए समारोह में अभय चौटाला की भूमिका और आयोजक दिज्विजय और उनके सांसद भैया दुष्यंत चौटाला की भाव भंगियां पूरे राजनैतिक प्रकरण पर सवाल खड़े कर देते हैं। राजनीति की सामान्य जानकारी रखने वालों को भी इस बात की जानकारी है कि इनेलो कैडर स्तर पर दो विचारधाराओं में बंट चुकी है। अभय चौटाला पार्टी पर जितनी मेहनत कर रहे हैं, वहीं अजय चौटाला के दोनों बेटें भी डट कर मेहनत कर रहे हैं। इसी मेहनत के बल पर दोनो भाईयों ने पार्टी का बड़ा कैडर अपने पाले में खड़ा किया हुआ है। ऐसी स्थिति में इनेलो और बसपा के गठबंधन पर भी प्रश्र चिंह तो लग ही जाता है। दूसरी ओर चर्चाकारों का यह भी कहना है कि मायावती का सपना प्रधानमंत्री बनने का है। राष्ट्रस्तर पर भाजपा के खिलाफ राजनैतिक दलों के महागठबंधन के प्रयासों के चलते बसपा के शामिल होने पर मायावती पर हरियाणा में इनेलो से गठबंधन पर दोबारा से सोचने का कांग्रेस का दबाव अवश्य रहेगा। दूसरे, 25 सितम्बर को गोहाना के ताऊ देवीलाल के जन्मदिन पर होने वाले समारोह में इनेलो का आंतरिक स्थिति भी अधिकांश साफ हो जायेगी। क्योकि अभी तक इस सम्मान समारोह की बागडोर अभय चौटाला के हाथ में ही है। इस समारोह में बसपा सुप्रीमो मायावती भी भाग लेने आयेगी। उन्होने गोहाना समारोह में ओने का अभय चौटाला का न्यौता स्वीकार किया हुआ है। अभी इनेलो-बसपा के राजनैतिक गठबंधन का भविष्य स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है।

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