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क्यों करना चाहिए व किसलिए जरूरी है श्राद्ध?

सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट | September 25, 2018 06:42 PM
सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट

क्यों करना चाहिए व किसलिए जरूरी है श्राद्ध?
श्राद्ध के तुरंत पश्चात जरूरी है गऊ माता की सेवा करना, इससे खुश होते हैं पितर: जयकरण शास्त्री


सतनाली मंडी (प्रिंस लांबा)।

 

श्राद्ध क्यों करना चाहिए व किस विधि द्वारा करना चाहिए, इस बारे में जब पंडित जयकरण शास्त्री नांगलमाला से बात कि तो उन्होंने बताया कि बह्मा पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम, उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों या गऊ माता को श्रद्धापूर्वक दी जाए, वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।

क्यों जरूरी है श्राद्ध?
इस बारे में शास्त्री बताते हैं कि लोगों में मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाएं तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

क्या दिया जाता है श्राद्ध में?
पंडित जयकरण ने बताया कि श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है।

श्राद्ध में कौए का महत्त्व:
कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है।

किस दिन करना चाहिए श्राद्ध?
इस बारे में पंडित जयकरण शास्त्री बताते हैं कि सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है। अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है। इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है जो इस प्रकार हैं:
1. पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है।
2. जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई यानि जो किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए हों उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।
3. साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है।
4. जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्वपितृ श्राद्ध कहा जाता है।

 


फोटो कैप्शन: पंडित जयकरण शास्त्री नांगलमाला फाईल फोटो।

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