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श्राद्धपक्ष में ढूंढे नहीं मिलते कौवे कंक्रीट के जंगलों के कारण कौओं के अस्तित्व पर खतरा

रणबीर रोहिल्ला | September 27, 2018 04:37 PM
रणबीर रोहिल्ला

श्राद्धपक्ष में ढूंढे नहीं मिलते कौवे
कंक्रीट के जंगलों के कारण कौओं के अस्तित्व पर खतरा


सोनीपत, रणबीर रोहिल्ला।

कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग व वृक्षों की अंधाधुंध कटाई और शहरों से गांव तक खड़े हो रहे कंक्रीट के जंगलों के कारण चिडिय़ों के बाद अब कौओं के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है। इसका जीता जागता प्रमाण श्राद्ध पक्ष में कौओं का न दिखाई देना है। शहरों में रहने वाले लोगों को अपने पितरों का श्राद्ध निकालकर कौओं को भोजन कराने के लिए घंटों अपने घरों की छतों पर और मैदानों में कौओं की बाट जोहते हुए देखा जा सकता है।
(आजकल सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो रहा है, जिस पर लिखा है कि श्राद्धपक्ष को देखते हुए कोवों की आपात बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जिस घर में बूढ़े माता-पिता के साथ बुरा व्यवहार होता हो उस घर के अन्न जल का बहिष्कार किया जाएगा। जो लोग जिंदा बुजुर्गों को रोटी नहीं दे सकते, वे मरे हुए पितरों को भोग लगाने के काबिल नहींं। )
नवरात्रों से 15 दिन पहले शुरू होने वाले श्राद्ध पक्ष में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए घर में पंडित बुलाकर हवन व पूजा पाठ कराते हैं। पंडित मंत्रोचारण के उपरांत पितरों के नाम कौओं के लिए भोजन निकालते है। वहीं दान पुण्य के लिए गाय और कुत्तों को भोजन कराने की सलाह भी देते हैं। अमावस्या के दिन श्राद्धपक्ष का आखिरी दिन होने के कारण और इस दिन भूले बिसरे तमाम पूर्वजों की आत्मा की शांति प्रदान करने के लिए प्रत्येक घर में श्राद्ध का आयोजन कर पंडित कौओं को विशेष पकवान का भोजन कराया जाता है। कौओं की कमी के कारण लोगों को काफी परेशानी होती है। उन्हें कौओं ढूंढे नहीं मिलतें हैं। बताया जाता है कि बढ़ते प्रदूषण, प्लास्टिक का अधिक प्रयोग शहरों में बढ़ता यातायात और प्रेशर हार्न की ध्वनि के कारण कौओं सहित अनेक परिंदे शहरों से विमुख हो रहे हैं। शहरों में वृक्ष, पेड़-पौधों की कमी के कारण परिंदों को आशियाने के लिए शहरों से पलायन करना पड़ रहा है।
हरियाणा विज्ञान मंच के राज्य सचिव कृष्ण वत्स ने बताया कि विष्णु पुराण अनुसार श्राद्ध में कौवों को पितरों का प्रतीक मानकर सोलह दिनों तक भक्ति और विनम्रता से यथाशक्ति भोजन कराने की बात कही गयीं है। पुरानी परंपरा अनुसार अगर कौवा हमारे आंगन में बोल रहा है तो समझो मेहमान आने वाला है। वास्तव में कौवौं को खाना खिलाना पक्षियों के प्रति हमारा सम्मान व उसके महत्व को दर्शाता है। यह एक ऐसा पक्षी है, जो सर्वहारी है अर्थात सब कुछ खाता है। कृष्ण वत्स ने कहा कि गिद्ध के बाद प्राकृतिक सफाई करने वाला पक्षी है। लेकिन पिछले कुछ समय से इनकी संख्या का कम होना चिंता का विषय है। इसका संभावित कारणों में मुख्यत खेती में अत्यधिक कीटनाशकों, पीडक़नाशकों, उर्वरकों का उपयोग जिससे वो कीट खत्म हो रहे हैं, जो इनका भोजन होते हैं। दूसरा पेड़ कटने से वास स्थान खत्म हो रहे हैं, जिससे इन्हें अण्डे देने व बच्चं विकसित करने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी पक्षी अपने को अनुकूलन नहीं कर पा रहे, जिससे बहुत सारी प्रजाति खत्म हो रही हैं। अब इनको सरंक्षण आवश्यक है। नहीं तो ये पक्षी भी गिद्ध की तरह विलुप्त हो जायेगा। उन्होंने कहा कि खेतों में कीटनाशकों एवं खरपतवार निकालने के लिए फसलों पर प्रयोग की जाने वाली जहरीली दवाओं के कारण परिंदों की निरंतर संख्या घटती जा रही है। जलवायु परिवर्तन और वृक्षों की कटाई से पक्षियों को आश्रय नहीं मिल पाता है। जिसकी वजह से वे सुरक्षित स्थानों की ओर से रूख कर रहे हैं। उन्होंने कहा परिंदों का अस्तित्व बचाने के लिए वन विभाग तथा कृषि विभाग को पेड़ पौधों और फसलों में कीटनाशकों को प्रयोग पर अंकुश लगाना चाहिए। सरकार को भी परिंदों के अस्तित्व को बचाने के लिए विशेष योजनाएं लागू करनी चाहिए। श्राद्धपक्ष में अपने पूर्वजों की आत्मा को शांतिल प्रदान करने के लिए लोग हर वर्ष कौओं को भोजन आदि कराते रहे हैं, लेकिन इस बार श्राद्ध के दिनों में लोगों को शहरी क्षेत्रों में कौए ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। लोगों को घंटों अपने घरों की छत पर कौओं की बाट जोहनी पड़ रही है।

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