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नवरात्र में कैसे करनी चाहिए देवी मां के नौ रूपों की पूजा, जानिए जयकरण शास्त्री से?

सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट | October 11, 2018 06:08 PM
सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट

नवरात्र में कैसे करनी चाहिए देवी मां के नौ रूपों की पूजा, जानिए जयकरण शास्त्री से?
नवरात्र में जरूरी है जरूरतमंदों को दान व गऊ माता की सेवा


सतनाली मंडी (प्रिंस लांबा)।

 

नवरात्र पर्व की पूजन विधि के बारे में पंडित जयकरण शास्त्री नांगलमाला से बात कि तो उन्होंने बताया कि नवरात्र पर्व के प्रथम दिन स्नान आदि के बाद घर में धरती माता, गुरुदेव व इष्ट देव को नमन करने के बाद गणेश जी का आह्वान करना चाहिए। इसके बाद कलश की स्थापना कर उसमें आम के पत्ते व पानी डालना चाहिए। कलश पर पानी वाले नारियल को लाल वस्त्र या फिर लाल मौली में बांध कर रखें व उसमें एक बादाम, दो सुपारी व एक सिक्का जरूर डालें। इसके बाद मां सरस्वती, लक्ष्मी व दुर्गा का आह्वान करें। धूप-बत्ती जलाकर देवी मां के सभी रूपों की पूजा करें। नवरात्र के खत्म होने पर कलश के जल का घर में छींटा मारें तथा कन्या पूजन के बाद प्रसाद वितरण करें।

नवरात्र पर्व के दिनों में देवी मां के नौ रूपों की कि जाती है पूजा-अर्चना:
1. नवरात्र पर्व के प्रथम दिन शैलपुत्री नामक देवी की आराधना की जाती है। पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि हिमालय के तप से प्रसन्न होकर आद्या शक्ति उनके यहां पुत्री के रूप में अवतरित हुई और इनके पूजन के साथ नवरात्र का शुभारंभ होता है।


2. पर्व के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती की कठिन तपस्या से तीनों लोक उनके समक्ष नतमस्तक हो गए थे। देवी का यह रूप तपस्या के तेज से ज्योतिर्मय है। इनके दाहिने हाथ में मंत्र जपने की माला तथा बाएं में कमंडल है।


3. नवरात्र के तीसरे दिन चंद्रघंटा नामक देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। इनके घंटे की ध्वनि सुनकर विनाशकारी शक्तियां तत्काल पलायन कर जाती हैं। व्याघ्र पर विराजमान तथा अनेक अस्त्रों से सुसज्जित मां चंद्रघंटा भक्त की रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहती हैं।


4. नवरात्र पर्व के चौथे दिन भगवती के इस अति विशिष्ट स्वरूप कूष्मांडा की आराधना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इनकी हंसी से ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ था। अष्टभुजी माता कूष्मांडा के हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र तथा गदा है। इनके आठवें हाथ में मनोवांछित फल देने वाली जपमाला है।


5. नवरात्र पर्व की पांचवीं तिथि को भगवती के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की पूजा की जाती है। देवी के एक पुत्र कुमार कार्तिकेय हैं, जिन्हें देवासुर-संग्राम में देवताओं का सेनापति बनाया गया था। इस रूप में देवी अपने पुत्र स्कंद को गोद में लिए बैठी होती हैं। स्कंदमाता अपने भक्तों को शौर्य प्रदान करती हैं।


6. इस पर्व के छठे दिन कात्यायनी देवी की पूजा होती है। कात्यायन ऋषि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुई तथा कात्यायनी कहलाई। यह देवी अमोघ फलदायिनी हैं।


7. नवरात्र पर्व के सातवें दिन सप्तमी को कालरात्रि की आराधना का विधान है। यह भगवती का विकराल रूप है। गंर्दभ पर आरूढ़ यह देवी अपने हाथों में लोहे का कांटा तथा खड्ग भी लिए हुए हैं। इनके भयानक स्वरूप को देखकर विध्वंसक शक्तियां पलायन कर जाती हैं।


8. नवरात्र पर्व की अष्टमी को महागौरी की आराधना की जाती है। यह भगवती का सौम्य रूप है। यह चतुर्भुजी माता वृषभ पर विराजमान हैं। इनके दो हाथों में त्रिशूल तथा डमरू है। अन्य दो हाथों द्वारा वर व अभय दान प्रदान करती हैं।


9. नवरात्र पर्व के अंतिम दिन नवमी को भगवती के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन किया जाता है। इनकी अनुकंपा से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं। अपनी चारों भुजाओं में वे शंख, चक्र, गदा व कमल धारण किए हुए हैं। सिद्धिदात्री की पूजा से नवरात्र में नवदुर्गा पूजा का अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है।

नवरात्र में जरूरी है जरूरतमंदों को दान व गाय की सेवा:
इस बारे में शास्त्री बताते हैं कि नवरात्र पर्व में देवी मां की पूजा-अर्चना कर भूखों को भोजन खिलाना चाहिए क्योंकि भूखों को भोजन व जरूरतमंदों को दान करने से देवी मां बहुत खुश होती हैं। इसके साथ-साथ नजदीक गौशाला या गांव में गऊ माता को हरा चारा, गुड़ या दाल आदि खिलाने चाहिए क्योंकि हिंदू धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि गाय में 33 करोड़ देवी-देवता वास करते हैं और गौमाता की सेवा करना सभी धर्मों से बढक़र है। अगर आप गाय की सेवा करते हैं तो देवी मां आपसे बहुत प्रसन्न होंगी व आपके परिवार पर उनकी कृपा-दृष्टि सदैव बनी रहेगी।

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