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ब्रह्मा के जरिए परमात्मा ने की नई दुनिया की स्थापना

AHN | January 17, 2017 07:15 PM
 प्रजापिता ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि 18 जनवरी पर विशेष -
ब्रह्मा के जरिए परमात्मा ने की नई दुनिया की स्थापना
     हिसार : प्रजापिता ब्रह्मा ही वे युग पुरुष हुए जिनमे तन का आधार परमात्मा शिव ने लिया और विश्व परिवर्तन की आधारशीला रखी। शिव ने दिव्य दृष्टि देकर उन्हें उस युग का साक्षात्कार कराया जिसका उन्हें निर्माण करना था। हम जिस असाधारण मनुष्य की जीवन कहानी का यहां उल्लेख कर रहे हैं उन्हें लोग स्नेह से दादा कहते थे, परंतु जब परमपिता परमात्मा ने उनके तन का आधार लिया तो उनका कत्र्तव्य वाचक नाम दिया - प्रजापिता ब्रह्मा। परमात्मा त्रिकालदर्शी हैं और सर्वज्ञ हैं उन्होंने करोड़ों मनुष्यों में से उस मनुष्य को चुनकर उसके तन में प्रवेश किया तो इसके पीछे अवश्य ही कोई कारण रहा होगा। परमात्मा ने दादा के तन का आधार लेने के पश्चात उस विशिष्ट पुरुष की अनेक जन्मों की कहानी बताई जिससे स्पष्ट होता है कि वह सचमुच में एक अद्भुत व्यक्ति थे।
प्रभावशाली व्यक्तित्व
     जिन्हें लोग स्नेह से दादा कहते थे। उनका पूरा नाम दादा लेखराज था। उनके व्यक्तित्व और स्वभाव को देखने से भी ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि साधारण मनुष्य तन में श्री नारायण स्वयं साकार हुए हैं। सूरत और सीरत दोनों का सुंदर होना यह किसी देव तुल्य मानव के ही भाग्य में होता है। उनके व्यक्तित्व में ऐसा चुम्बकीय आकर्षण था कि जो भी उनके संबंध सम्पर्क में आता था वह उनसे स्नेह और अपनत्व का ही अनुभव करता था। उनका मुखमंडल दिव्य कांति से दैदीप्यमान था और उनके नेत्रों में देखने से ऐसा लगता था कि जैसे उनमें सारे संसार के लिए स्नेह और सौहार्द छलक रहा हो।
हीरे जवाहरातों की थी अचूक परख
     दादा लेखराज का जन्म सन् 1876 में सिंध के कृपलानी परिवार में एक वल्लभाचारी भक्त के यहां हुआ था। दादा अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ द्वारा गेहूं के एक छोटे से व्यापारी से उठकर प्रसिद्ध जौहरी बन गए थे। उन्हें हीरे-जवाहरातों की अचूक परख थी। अपनी इस विशेषता के कारण ही उन्हें नेपाल के राज्यकुल तथा उदयपुर के महाराज का विशेष आतिथ्य और स्नेह सम्मान प्राप्त था और वे उनके राज दरबार में भी आमंत्रित होते थे। उनके उदारचित्त व्यवहार से प्रभावित होकर कई बार तो राजा लोग उन्हें कहते थे लखीराम बाबू, भगवान से तो भूल हो गई कि हमको तो राजा बनाया परंतु आपको नहीं बनाया, राजापन के सभी संस्कार तो आप में हैं परंतु वास्तव में भगवान ने भूल नहीं की थी क्योंकि वे राजे तो एक ताज वाले राजा थे जबकि भगवान ने दादा को तो दो ताज वाला दैवी राजा बनने का पुरुषार्थ कराया।
कभी नहीं टाली गुरु की आज्ञा
     दादा के जीवन की यही विशेषता थी कि वे कभी भी गुरु की आज्ञा नहीं टालते थे। गुरु जिस समय जो कह दें उसे भगवान की आज्ञा मानकर पालन करते थे। वे गुरु की हर आज्ञा को शिरोधार्य मानते थे। चाहे कुछ भी घटित क्यों न हो जाए लेकिन वो गुरु की आज्ञा नहीं टालते थे। इसका पता इस घटना से चलता है कि एक बार उनके पोते का नामकरण संस्कार होना था। सायंकाल का समय था उस समय शहर के बड़े-बड़े व्यक्ति भोज के लिए उपस्थित थे। अचानक ही गुरु का तार आया कि तुरंत आओ। दादा ने अपनी पत्नी को कहा कि तुरंत कपड़े निकालो और ड्राईवर को बुलाओ क्योंकि मुझे जाना है। तब उनकी पत्नी ने कहा कि इस अवसर पर कैसे जा सकते हें। तब दादा ने कहा कि गुरु का बुलावा गोया काल का बुलावा है। काल आये तो क्या हम उसे ऐसा कहकर रोक सकते हैं कि आज हमारे पोते का नामकरण है। गुरु के प्रति ऐसी निष्ठा, भक्ति और सम्मान देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।
ब्रह्मा मुख से परमात्मा ने दिया स्वयं का सत्य परिचय
     एक बार की बात है दादा ने गुरु के आगमन पर एक बहुत बड़ी सभा का आयोजन किया। उसमें शहर के काफी प्रतिष्ठि लोग आए हुए थे। उन लोगों के बीच में दादा का उठना-बैठना, बोलना-चलना, सबकुछ अलग अनुभव हो रहा था। गुरु का प्रवचन चल रहा था तभी अचानक दादा वहां से उठकर अपने कमरे में चले गए। अचानक उठ कर चले जाना उनकी पत्नी को कुछ अच्छा नहीं लगा और वो उनके पीछे-पीछे कमरे तक आ गई और देखा कि दादा बहुत ही ध्यान मग्र मुद्रा में बैठे हुए हैं और उनकी आंखों में इतनी लाली थी जैसे कि कोई लाल बत्ती जल रही हो। उनका चेहरा भी एकदम लाल था और कमरा भी दिव्य प्रकाश से प्रकाशमय हो गया था। तभी दूर से एक आवाज आती हुई सुनाई दी जैसे कि दादा के मुख से कोई बोल रहा हो और वह आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई। वह आवाज थी - 'निजानन्द स्वरूपं, शिवोहम् शिवोहम्, ज्ञान स्वरूपं शिवोहम् शिवोहम्, प्रकाश स्वरूपं शिवोहम् शिवोहम्।Ó फिर दादा के नयन बंद हो गए। जब उनके नयन खुले तो वे ऊपर-नीचे कमरे में चारों ओर आश्चर्य से देखने लगे। उन्होंने जो कुछ देखा था वे उसकी स्मृति में लवलीन थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि एक लाईट थी, कोई माईट थी, कोई नई दुनिया थी। उसके बहुत ही दूर, ऊपर सितारों की तरह कोई थे और जब वह स्टार नीचे आते थे तो कोई राजकुमार बन जाता था तो कोई राजकुमारी बन जाती थी। एक लाइट और माइट ने कहा कि तुम्हें ऐसी दुनिया बनानी है, परंतु उसने कुछ बताया नहीं कि कैसे बनानी है। मैं यह दुनिया कैसे बनाऊंगा...।
सतयुगी दुनिया की स्थापना का निर्देश
     अब दादा बहुत ही ध्यान मग्न और अंतर्मुखी अवस्था में रहने लगे। वे अक्सर यह सोचा करते थे कि वह कौन सी शक्ति है जो मुझे ऐसे ज्ञानयुक्त दिव्य साक्षात्कार कराती है, इसके पीछे रहस्य क्या है। फिर आगे चलकर यह रहस्य स्पष्ट हुआ कि परमपिता परमात्मा शिव ने दादा के तन में प्रवेश होकर स्वयं अपना परिचय दिया और उन्होंने ही दादा को कलियुगी सृष्टि के महाविनाश का तथा आने वाली सतयुगी सृष्टि का भी साक्षात्कार कराया था और उस पावन सृष्टि की स्थापनार्थ उन्हें निमित्त अथवा माध्यम बनने का निर्देश दिया था।
हर उत्सव को बना देते थे आध्यात्मिक
     दादा में भक्ति के संस्कार इतने पक्के थे कि चाहे कैसा भी अवसर क्यों न हो, उनके कर्मों में भक्ति की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती थी। शादी-विवाह के अवसरों पर वे हीरे-सोने तथा लाखों का सामान तो देते ही थे लेकिन इसके अतिरिक्त वे नव दंपत्ति को श्रीमद्भागवतगीता तथा चांदी का एक सुंदर मंदिर भी विशेष रूप से सौगात में भेंट किया करते थे। इसके पीछे उनकी यही भावना रहती थी कि वर और वधू दोनों के जीवन में भक्ति भावना बनी रहे जिससे वे सत्य के मार्ग पर चलते रहें। वे शादी के अवसरों पर भी अपने गुरु को आमंत्रित कर लिया करते थे और शादी को एक सत्संग का रूप दे देते थे अर्थात वे उस अवसर को भी धार्मिक बना देते थे तथा अन्य लोगों की तुलना में उसे निराले ढंग से संपन्न करते थे। विवाह तो ऐसा लगता था कि जैसे कलियुग में किसी देवी और देवता का विवाह हो रहा हो। इस प्रकार उनके यहां के कार्यक्रमों में सांसारिकता देखने को नहीं मिलती थी। 
साक्षात्कार ने बदली जीवन की दिशा
     विष्णु हुए साक्षात्कार : जब वे मुंबई में बाबुलनाथ के मंदिर के सामने वाले अपने घर के विशाल आंगन में हो रहे सत्संग में बैठे थे, तो उन्हें एक निराला आंतरिक अनुभव होने लगा। वे सत्संग के स्थान से उठकर अपने कमरे में चले गए। उन्हें शरीर का भान नहीं था। उस अवस्था में उन्हें सबसे पहले विष्णु चतुर्भुज का दिव्य साक्षात्कार हुआ। दादा ने सोचा कि गुरु ने ही ये साक्षात्कार करवाए होंगे परंतु गुरु के हाव-भाव से उन्होंने समझा कि गुरु इन बातों से बिल्कुल ही अपरिचित हैं और दिव्य साक्षात्कार कराना उनकी सामथ्र्य से बिल्कुल बाहर की बात है। अत: उनका मन अब परमपिता परमात्मा की ओर मुड़ा जो ही वास्तव में उनका सद्गुरु है।
     सृष्टि के महापरिवर्तन का दिव्य साक्षात्कार : कुछ समय बाद दादा वाराणसीमें चले गए। वहां एकांत में बैठकर जब वे प्रभु चिंतन किया करते थे तब उन्हें नित्य नए-नए अनुभव और कई दिव्य साक्षात्कार होने लगे। एक दिन दादा को निराकार ज्योतिर्लिंगम् शिव परमात्मा का साक्षात्कार हुआ तथा कलियुगी सृष्टि के महाविनाश का भी साक्षात्कार हुआ। दादा ने देखा कि बहुत ही भयंकर बम बनाए गए हैं। उनके विस्फोट से असहाय अग्रि निकल रही है। उन्हें आभास हुआ कि यह 5000 वर्ष पहले महाभारत युद्ध में जिन अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग हुआ था और जिन्हें महाभारत ग्रंथ में अग्रि बाण, ब्रह्मास्त्र और मूसल कहा गया है, वे यही अस्त्र-शस्त्र हैं और इन्हीं के द्वारा लोगों का महाविनाश हो रहा है। इन दृश्यों को देखकर दादा के आंखों में आंसू बहने लगे और वे कहने लगे अब बस करो प्रभु-बस करो। जिन दनों उन्हें यह साक्षात्कार हुआ, उस समय तक अमेरिका ने ऐटम और हाईड्रोजन बम हिरोशिमा और नागासाकी पर नहीं गिराए थे बल्कि तब वैज्ञानिक लोग प्रयोगशाला में उस पर रिसर्च कर रहे थे। 
     वे नारी जाति का बहुत सम्मान करते थे उन्होंने अपनी संस्था में नारियों को सदा आगे रखा। वे नारी सशक्तिकरण की जीती जागती मिसाल थे। ब्रह्मा बाबा ने 18 जनवरी 1969 को अपनी भौतिक देह का त्याग कर दिया। उनकी पुण्यतिथि को विश्व शांति दिवस के रूप में 135 देशों की 9500 शाखाओं द्वारा मनाया जा रहा है
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