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मेवात की लोक संस्कृति एवं गायन गायकी में अश्लील शब्दों का इस्तेमाल समाज में कलाकार बढ़े, , मान घटा

एएच ब्यूरो | June 07, 2017 04:28 PM
एएच ब्यूरो


तेजी से बदलती मेवात की लोक संस्कृति एवं गायन
गायकी में अश्लील  शब्दों का इस्तेमाल
समाज में कलाकार बढ़े, उनका मान घटा
नूंह (धनेश विद्यार्थी) : कई दशकों से विकास की बयार की बाट जोहता मेवात अब बदलता-सा नजर आता है। इसके पीछे तालीम का प्रसार, लोगों की सोच में बदलाव और भौतिकवादी माहौल का असर पडऩे लगा है।
हरियाणा, राजस्थान और यूपी के बीच अरावली पर्वतमाला के साथ बसे मेवात इलाके में बीते कुछ सालों में लोगों का खान-पान, बोलभाषा, पहनावा, यातायात के साधन, खेती के तौर-तरीके और लोक व्यवहार तेजी से बदला है। विकास के मामले में पूर्ववर्ती सरकारों की तंगदिली ने मेवात का नाम नूंह करने के लिए लोगों को प्रेरित किया और सरकार ने उसे सिरे चढ़ाया मगर विकास के बिना सब सूना है।
अब करीब तीन दशक में हरियाणा के मेवात जिले की रची-बसी लोक संस्कृति और गायन के तौर-तरीके बदलने के साथ ही गीत-संगीन सुनने के शौकीन श्रौताओं की पसंद भी बदल गई है। शादी-ब्याह में फिल्मी धुनों के साथ डीजे ने युवाओं को अपनी ओर खींच लिया है। पुराने लोक कलाकारों की कद्र समाज में घटी है लेकिन कलाकारों की संख्या बढ़ गई है। फिल्मी धुनों पर अश£ील शब्दों वाले गानों ने मेवात में बसने वाले संगीत के दीवानों को बेआबरू कर दिया है।
मेवात में खेती-बाड़ी के तौर-तरीके बदल गए हैं। पहले बैल से खेतों की जुताई होती थी। रहट से फसल की सींच होती थी। डीजल चलित ईंजन ने गिरती खेती को संभाला और किसान को आर्थिक परेशानियों से बाहर निकलने का मौका दिया। मगर बाद विद्युत-चलित मोटरें आई तो धरती के नीचे का पानी रसातल में चला गया। मौजूदा वक्त मेवात का किसान और खेती दोनों संकट में हैं।
मेवात में दो दशक पहले तक एक स्थान से दूसरी जगह आने-जाने के लिए बैलगाड़ी, अरथ-बेहली, घोड़ा और ऊंट की सवारी की जाती थी। अब निजी मोटर बाइक, कारें और सरकारी बसें चल रही हैं। लोक बोल-भाषा में बदलाव और गायन के तौर-तरीके बदल गए हैं। मेवाती भाषा के गीत युवाओं के गले का सहारा लेकर अश£ील शब्द और भाव के साथ इशारों के साथ परोसे जा रहे हैं, जिसने लोक गायन को बदनामी के कगार पर लाकर खड़ा किया है।
मेवाती के कद्रदान भी इससे शर्मिंदा हैं। ऐसा होने से मेवाती लोक भाषा अपना वजूद खोती जा रही है। अब सरकारें मेवाती भाषा को बढ़ावा देने में पीछे रही। रही-सही कसर आधुनिक फिल्मी संगीत, मोबाइल पर फ्री इंटरनेट और सिनेमा ने पूरी कर दी। एक जमाने में मेवात में मशहूर सांगी शकूर खान की तूती बोलती थी मगर उनके बाद नाम कमाने में गायक पिछड़ गए।
जनसंपर्क एवं लोक भाषा विभाग में करीब 26 साल तक अपनी सेवाएं देने वाले चिमटा वादक शहीद खान बताते हैं कि पूर्व उप प्रधानमंत्री स्व. चौधरी देवीलाल की सरकार में उन्होंने इस विभाग में अपनी सेवाएं देना शुरू किया। मेवाती लोक भाषा और गायन में करीब तीस साल के भीतर कई बदलाव हमने महसूस किए।
हमारे विभाग में ही पहले गांव-गांव तक भजन मंडलियां सरपंच और पंचायत सदस्यों से संपर्क स्थापित करके रात के वक्त सामाजिक बुराईयों के विरुद्ध तथा सरकारी नीतियों का लाभ उठाने के लिए आमजन से अपील करती थी। प्रोजेक्टर के माध्यम से पर्दे पर फिल्म दिखाई जाती थी। अब मद्यपान करने वालों की तादाद बढऩे की वजह से रातों को लोक संपर्क विभाग के कलाकार भी प्रचार कार्यक्रम देने से कतराने लगे हैं।
लोक कलाकार अब नेताओं की सभा में भीड़ जुटाने के लिए बुलाए जाने लगे हैं। भौतिकवादी युग का असर होने की वजह से धन की ताकत ने कलाकार की कद्र को कम कर दिया है। सवाल यह है कि आखिर लोक भाषा को प्रोत्साहन देने और कलाकारों को समाज में मान-सम्मान दिलाने के लिए हरियाणा सरकार कब मेवाती लोक भाषा एवं कलाकार संवर्धन बोर्ड का गठन करती है। लोक भाषा की सेवा करने वाले कलाकारों को कब सरकार उनके परिजनों के बीच सम्मानजनक रुतबा देने के लिए कदम उठाएगी।

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