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आधुनिक व्यवस्था प्रोफेशनल बनाती है इंसान नहीं "

अटल हिन्द ब्यूरो | July 25, 2017 06:07 AM
अटल हिन्द ब्यूरो

 

आधुनिक व्यवस्था प्रोफेशनल बनाती है इंसान नहीं "

पूर्व शिक्षा प्रणाली ने हमें महान इंसान दिए हैं। जैसे महामना मदन मोहन मालवीय, ईश्वर चंद विद्यासागर, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जगदीश चंद बोस, स्वामी विवेकानंद तथा अन्य महापुरुष आदि । इन महान लोगों ने धन को कभी महत्व नहीं दिया । उच्च शिक्षा प्राप्त करने बाद भी यह कभी तुच्छ धन के पीछे नहीं भागे क्योंकि यह जानते थे कि केवल धनार्जन ही मानव जीवन का उद्देश्य नहीं है।

इंसानियत- हैवानियत में और मानवता- पुशता में परिवर्तित दिखाई देती है। 
अब प्रश्न यह है -कि यह इंसानियत क्या है ? जिससे आदमी इंसान बनता है। हाँ ! यह इंसानियत ही एक आदमी को इंसान बनाती है। हमारे सभी जीवन मूल्य या नैतिक गुण जैसे - दया, करूण, ममता , धैर्य, वाणी में मधुरता, सहनशीलता, सेवा, परोपकार ,प्रेम-सम्मान, अनुशासन, राष्ट्र प्रेम आदि ऐसे गुण जिनका इंसान में होना अनिवार्य है । जिसके कारण एक व्यक्ति इंसान कहलाने का अधिकारी होता है।


अब प्रश्न यह उठता है -कि आदमी, मानव, इंसान इन सबमें क्या अंतर है । सभी तो पर्यायवाची शब्द हैं । पर इनका जो गुण है वह कहीं लुप्त होता जा रहा है। आदमीयत, मानवता, इंसानियत कहीं खोती जा रही है। इंसानियत- हैवानियत में और मानवता- पुशता में परिवर्तित दिखाई देती है।
अब प्रश्न यह है -कि यह इंसानियत क्या है ? जिससे आदमी इंसान बनता है। हाँ ! यह इंसानियत ही एक आदमी को इंसान बनाती है। हमारे सभी जीवन मूल्य या नैतिक गुण जैसे - दया, करूण, ममता , धैर्य, वाणी में मधुरता, सहनशीलता, सेवा, परोपकार ,प्रेम-सम्मान, अनुशासन, राष्ट्र प्रेम आदि ऐसे गुण जिनका इंसान में होना अनिवार्य है । जिसके कारण एक व्यक्ति इंसान कहलाने का अधिकारी होता है। यह गुण मानव में जन्मजात होते हैं। लेकिन दुर्व्यसनों तथा कुप्रवृत्तियों के कारण मनुष्य इन गुणों से दूर होता जा रहा है। पशु का गुण होता है-पशुता ।
पशुओं में मनुष्य जैसे बोलने और समझने की शक्ति नहीं है। इसलिए वह पशु की श्रेणी में आते हैं। पर बड़े दुख की बात है कि आज मनुष्य में पशुता और पशुओं में मनुष्यता का का गुण दिखाई देता है। आप पक्षियों को दाना डालिए और देखिए वे अकेले नहीं खाते हैं आवाज करके पहले सभी साथियों को बुला लेते हैं। तत्पश्चात मिल बाँटकर खाते हैं । पर आज का मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचता है । यहाँ तक की अब वह अपने परिवार से भी कटता जा रहा है। आँखों के सामने किसी को दीन-हीन अवस्था में देखकर भी अनदेखा कर देता है। अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देता है।
ऐसा व्यक्ति इंसान कहलाने का अधिकारी कदापि नहीं हो सकता है।
आज की व्यवस्था मनुष्य को धन के पीछे भागना सिखाती है। बच्चों से लेकर बड़े तक सभी नैतिक मूल्यों से शून्य होते जा रहे हैं। लोगों के अंदर ईर्ष्या, द्वेष आदि भावनाएं घर करती जा रही हैं। परोपकार की भावना समाप्त होती जा रही है। विद्यार्थियों में अंकों की होड़ लगी हुई है ।आज हर कोई अच्छे अंक लाकर अधिक से अधिक धन कमाना
चाहता है । आज के माता-पिता चार-पांच साल के बच्चे से पूछते हैं बेटा तुम बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या वकील क्या बनोगे ।छोटे से बच्चों को तोते की तरह यह शब्द रटवा दिए जाते हैं। कोई भी अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान बनने की तरफ प्रेरित नहीं करता है।
मुझे आज भी याद हैं अपने बचपन के वे दिन 1969 की बात है जब हमारे पिता हर दिन संध्या समय हम सब भाई बहनों को नैतिक मूल्यों से संबंधित कहानियां सुनाया करते थे । हमसे पूरे दिन की दिनचर्या पूछी जाती थी और लिखने को कहा जाता था । तत्पश्चात प्रत्येक दिन के गलत कार्य में सुधार करने की सीख दी जाती थी । कम अंक आने पर मार नहीं पड़ती थी पर गलत कार्य करने पर मार अवश्य पड़ती थी।
आज माता-पिता के पास समय ही नहीं है कि वह अपने बच्चों के साथ बैठकर बात कर सके क्योंकि आज धन का महत्व बहुत अधिक बड़ गया है ।
आज हर कोई अपने को प्रोफेशनल मानता है । अपने प्रोफेशन या कार्य में दक्ष होकर, अव्यावहारिक होकर कार्य करना अर्थात नैतिक मूल्यों को ताक पर रख कर घड़ी की नोक पर चलना ।
धन को अहमियत देना । हमारी आज की व्यवस्था ऐसे ही प्रोफेशनलों की एक बड़ी फौज तैयार कर रही हैं। जिनके लिए स्वहित सर्वप्रथम होता है।
ऐसे लोग देश हित के बारे में तो स्वप्न में भी नहीं सोचते हैं । अपने लाभ के लिए देश का अहित करने से भी नहीं चूकते हैं । खाद्य पदार्थों की मिलावट से हजारों की जान जाती है तो जाए पर उनका तो बैंक बैलेंस बड़ गया ।उनके हृदय से करूणा स्रोत सूख चुका होता है। इसलिए आज मानव दानव होता जा रहा है । संवेदना शून्य होता जा रहा है। पहले वह देश व समाज से कटा और अब तो अपने परिवार से भी कटने लगा है । अब वह सिर्फ तीन या चार लोगों के परिवार को ही अपना परिवार मानता है। यह स्थिति समाज देश व दुनिया के लिए बहुत घातक है। अगर समय रहते मानव ने मानवता के गुणों को आत्मसात नहीं किया तो इस दुनिया का सर्वनाश निश्चित है । भगवान भी उसे बचा नहीं सकते । भलाई इसी में है कि हम रिश्तों का महत्व समझे । आँख बंद करके पैसे के पीछे न भागे ।अपने बच्चों को नैतिक मूल्यों से ओत-प्रोत करे। जिससे हर बच्चा यह कह सके मैं बड़ा होकर एक अच्छा इंसान बनूँगा ।

निशा नंदिनी गुप्ता
तिनसुकिया, असम

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