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...जनता के नौकर की जगह तानाशाह बन बैठे हैं सरकारी बाबू....

प्रदीप दलाल | August 09, 2017 05:20 AM
प्रदीप दलाल

 

 

...जनता के नौकर की जगह तानाशाह बन बैठे हैं सरकारी बाबू....


चंडीगढ में दो दिन पूर्व हुए छेडख़ानी मामले की हर ओर गूंज है। होनी भी चाहिए क्योंकि मामला छेडखानी का है और वह भी हाईप्रोफाइल मामला वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की बेटी और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे का। हर कोई बेटी को न्याय के लिए आवाज उठा रहा है, अच्छी बात है। यह वह समय है जब आईएएस की बेटी को न्याय दिलाने के लिए आम और हर तबके का व्यक्ति उठ खड़ा हुआ है लेकिन जब कोई आम आदमी किसी आईएएस अधिकारी या आईपीएस अधिकारी के पास जाता है, तब इनका व्यवहार आम आदमी से कैसा होता है। यह किसी से छिपा नहीं है। आज एक आईएएस अधिकारी अपनी बेटी के लिए न्याय मांग रहा है। आज वह अधिकारी आम हो चला है क्योंकि आज उससे भी ताकतवर सियासी आदमी से इंसाफ को लेकर उसे दर दर भटकना पड़ रहा है लेकिन जब धाराएँ बदल दी जाती हैं। कानून पलट दिए जाते हैं। सीसीटीवी में सबूत नहीं मिलते, तब जाकर समझ आता है आम बनाम खास का अंतर। आज वह आईएएस अधिकारी शायद सिस्टम की मार को समझ रहा है। आज एक बाप अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए मजबूर हो चला है। ऐसे ही न जाने कितने बाप और भाई हैं जो अपनी बहन-बेटी को न्याय दिलाने के लिए सरकारी बाबाओं के दफ्तर के चक्कर लगाते हैं और यह सरकारी बाबू कार्रवाई न करके उन्हें मजबूर बना देते हैं। तब सिस्टम से हारे और उनकी आंसुओं से बहे उन आँसुओ का जवाब है किसी के पास। सोचिए जब वरिष्ठ अधिकारी इंसाफ के लिए चैनल पर कार्रवाई की मांग कर रहा है तो आम आदमी को कैसे इंसाफ मिलता होगा। यह गंभीरता से सोचने का विषय है। देश में ऐसे हजारों पिता हैं जो न्याय की गुहार लगाते-लगाते थक जाते हैं इस सडे-गले सिस्टम के आगे लेकिन न्याय मिलना तो दूर उनसे ही ऐसे बर्ताव किया जाता है मानों उन्होंने ही न्याय की मांग करके कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो। आईएएस अधिकारी और एक बेटी के बाप को न्याय मिलना चाहिए लेकिन उन लोगों की आवाज को कौन उठाएगा जो साधारण परिवारों से हैं। उनकी दबी कुचली और इस सडे गले सिस्टम से हार चुकी आवाज को कौन उठाएगा। उन्हें न यह मीडिया दिखाएगा और शायद न ही पुलिस अपराधियों को चंद मिनटों में पकड़ पाएगी। न ही केस दर्ज होगा और न ही सबूत मिलेंगे और भी न जाने क्या-क्या। आज कुर्सी और शक्ति का नशा बहुत बडा हो चला है और नौकरशाह अब तानाशाह बन बैठे हैं। कुर्सी के अहंकार में चूर यह अधिकारी पीडि़त लोगों से ऐसा बर्ताव करते हैं मानो वह न्याय मांगने के काबिल ही न हों और अगर मामला आम बनाम खास का हो तो अधिकारी केस दर्ज करना या एक्शन लेना तो दूर पीडि़तों को डराने धमकाने का कार्य करते हैं। तब न्याय की मांग करते उस आम आदमी पर क्या गुजरती होगी, यह सोचने वाली बात है। बेटी, बहन सबकी समान होती है, आवाज सबके लिए उठानी चाहिए और न्याय भी सबके लिए समान होना चाहिए। इस मामले ने तो इसलिए तूल पकड़ लिए क्योंकि इससे सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच तलवारें तन गई और मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया लेकिन उन मामलों का क्या जो बसों में जाती लड़कियों को रोज झेलना पड़ता है। उनपर कॉमेंट्स किए जाते हैं लेकिन ऐसे मामलों को कोई नहीं देखता। उन मामलों का क्या जिनमें क्रूरता की हदें पर हो जाती हैं लेकिन पुलिस अंत तक यही कहती रहती है कि कार्रवाई चल रही है लेकिन वह कार्रवाई कभी खत्म ही नहीं होती। आखिर न्याय सिर्फ खास के लिए है क्या। लड़की अधिकारी की थी। अगर यही लड़की कोई साधारण परिवार से होती तो.....मामला ही दर्ज नहीं हो पाता शायद। ऐसे में रोती-सिसकती उस आवाज को कोई नहीं सुनता, जो इस बिकाऊ और क्रूर सिस्टम से हार चुकी हो, तब मानवता दम तोड़ देती है लेकिन सरकारी बाबू इसे रोज का काम समझकर अपनी ानवता अपनी ड्यूटी और अपना वह फर्ज भुला देते हैं। जिसकी शपथ उन्होंने नौकरी ज्वाइन करते हुए ली थी। अधिकारी संवेधानिक रूप से जनता के नौकर होते हैं और जनता के टैक्स से ही उन्हें मोटी सैलरी, गाड़ी, बंगला, भत्ते और तमाम सुविधायें मिलती है लेकिन आज यही अधिकारी तानाशाह बन बैठे हैं। इनका बर्ताव कैसा होता है, यह सब जानते ही हैं। शक्ति के नशे में चूर यह अधिकारी लोगों को अपनी कठपुतली समझते हैं लेकिन इस तरह के वाक्ये चंडीगढ मामला यह दर्शाते हैं कि मुसीबत बताकर नहीं आती और मुसीबत किसी पर भी आ सकती है इसलिए हर उस आम आदमी की बहन, बेटी के लिए भी अधिकारी इसी तरह की ततपरता और चपलता दिखाएँ। जिससे उन्हें भी न्याय मिल सके। अधिकारियों के दफ्तरों के बाहर लोगों की न्याय पाने के लिए लम्बी लाईनें लगी होती है लेकिन यह सरकारी बाबू हैं कि उनकी सुनते ही नहीं और आम आदमी दर-दर की ठोकरे खाकर इंसाफ की डगर ही छोड़ देता है। यह वह समय है जब इन बड़े सरकारी बाबुओं को अपने अंतरात्मा से पूछना चाहिए कि जितने समय में वह खुद के लिए न्याय चाहते हैं। वह खुद भी उतने समय में न्याय के लिए उस आम आदमी की आवाज भी बुलन्द करें, जो इन अधिकारियों से न्याय की उम्मीद लगाता है और यह उसे डांट फटकार कर चलता करते हैं या उन्हें बस झूठे दिलासे देते हैं। कानून रसूखदारों के लिए कुछ ज्यादा ही ततपरता से काम करता है लेकिन आम आदमी के मामले में कानून बौना बन जाता है। अधिकारी अपनी मजबूरियां और कानून ना होने का रोना रोते हैं। समय है जागो नहीं तो बुरा समय किसी को बताकर नहीं आता और बुरे समय में अगर आम आदमी का साथ नहीं मिला तो फिर तो खास को भी न्याय मिलने से रहा। दबे-कुचले लोगों की आवाज को इस सड़े-गले सिस्टम को सुनना ही होगा। अगर फिर भी नहीं सुनी तो यह तो समय का फेर है साहब! कब किसपर आ पड़े पता नहीं चलता और कहा जाता है कि गरीब की हाय तो पत्थर को भी चकनाचूर कर देती है तो ऐसे में जनता के नौकर जोकि कुर्सी के नशे में चूर हो आम आदमी की आवाज को सुनना नही चाहते वह तो पत्थर भी नहीं हैं जो सह पाएंगें, इसलिए सोचिए और बेहद गम्भीरता से सोचिए.......

जर्नलिस्ट प्रदीप दलाल की कलम से...

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