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चन्द कागज के टुकड़ों के आगे हार गई 30 मासूमों की जिंदगी.....

प्रदीप दलाल | August 12, 2017 09:06 PM
प्रदीप दलाल

चन्द कागज के टुकड़ों के आगे हार गई 30 मासूमों की जिंदगी.....

आत्महत्या करती मानवता और तिल-तिल मरती संवेदनाओं का देश बनकर रह गया है हमारा देश। कितनी सस्ती हो चुकी है आज किसी की भी जान। जान से ज्यादा कीमत पैसे की हो चली है। जब ऑक्सीजन के अभाव में उन 30 मासूमों के साँसे उखड़ी होंगी, वो तड़प उठे होंगे ऑक्सीजन को लेकिन ऑक्सीजन तो जान से महंगी हो चली थी आखिर कहाँ से मिलती। उस ऊपरवाले का दिल भी नहीं पसीजा जब 30 घरों के चिराग़ बुझे होंगे। उन माँओं के दिल पर क्या गुजरी होगी, जब उनका लाल बेबसी और अभाव के चलते असामयिक इस दुनिया से चला गया हो लेकिन इस दर्द को समझे कौन। पत्थर हैं यहां तो सबके सब, मुखौटे लगाकर घूम रहे हैं सब। यूपी में 30 मासूम जिंदगियाँ उस समय बेमौत मर गई, जब वहां उन बच्चों को ऑक्सीजन नहीं मिला। अस्पताल को ऑक्सीजन के 69 लाख रुपये चुकाने थे लेकिन अस्पताल के पैसे न चुकाने की सजा उन 30 मासूमों को मिली। जिन्होंने अभी अपने सपनों को जिया भी नहीं था। जो शायद भविष्य में अपने परिवारों का सहारा बनते लेकिन अब वह 30 कोहिनूर हमारे बीच में नहीं हैं। हर जगह संवेदनायें प्रकट की जा रही हैं। हर ओर मातम पसरा है लेकिन इन सबके बीच 30 मासूमों की मौत हमारी स्वास्थ्य प्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है। इन 30 बच्चों की मौत असामयिक हुई है। चन्द पैसा न चुकाना किसी की जान पर इतना भारी पड़ सकता है। सोच कर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस सवाल का जवाब यह है कि हाँ अगर यही बच्चे नेताओं और बड़े अधिकारियों, बड़े बिजनेसमैनों के होते तो ना तो ऑक्सीजन ही कम पड़ती और न ही सप्लाई बंद की जाती। 30 मासूम जिनके परिवार के थे। उनसे पूछो उनके खोने का दर्द। उनका कलेजा आज फटने को है और मानो वह चीख-चीखकर हमारी सड़ी-गली व्यवस्था को गाली दे रहे हों लेकिन यहाँ किसको फर्क पड़ता है। भला किसी वीआईपी के बच्चे थोड़े ही थे जो इन्हें फर्क पड़े। अगर होते तो यह नौबत ही न आती। वैसे कमाल की बात है ना हमारे देश में कथित रूप से जब सांसदों और विधायकों को खरीदा जाता है, तब पैसे कम नहीं पड़ते। जब सांसदों और विधायकों को महंगे होटलों में ठहराया जाता है, तब भी पैसे कम नहीं पड़ते। जब करोड़ों-अरबों रुपये विदेश यात्राओं पर उड़ा दिए जाते हैं, तब भी पैसे कम नहीं पड़ते। जब बड़े सरकारी बाबुओं को मोटी सैलरी और सुख-सुविधाओं के नाम पर करोड़ों खर्च दिए जाते हैं तब पैसे कम नहीं पड़ते तो उन 30 मासूमों के लिए ऑक्सीजन के पैसे कैसे कम पड़ गए। अब यह पैसे 30 मासूमों की जिन्दगियों से ज्यादा दिखने लगे थे, शायद बच्चे बड़े परिवारों से नहीं थे इसलिए न अस्पताल प्रशासन को फर्क पड़ा, ना ऑक्सीजन रोकने वाली कम्पनी को और ना ही सरकार को लेकिन उन मासूमों का क्या जिनकी हत्या कर दी गई। यह हत्या ही तो है जो यूपी में हुई है इसलिए अब अस्पताल प्रशासन, वहां के प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं पर हत्या का केस दर्ज कर कार्रवाई होनी चाहिए। नीले, पीले, सफेद और गुलाबी रंग के कुर्ते पहन यह सियासी रंगबाज कपड़ों की तरह अपना रंग भी बदलते हैं और इनके आगे तो गिरगिट भी फैल है। बड़े-बड़े भाषण देने वाले नेता आज अस्पताल नहीं पहुंचे। राजनीतिक चमकाने के चक्कर में रहने वाले नेताओं ने न ही कोई ट्वीट कर संवेदनायें व्यक्त की। गरीब के घरों में रोटी खाकर ड्रामा करने वाले आज कहीं नजर नहीं आए, जब गरीबों का सहारा मासूम चन्द कागज के टुकड़ों के आगे दम तोड़ रहे थे। आज किसी की अंतरात्मा नहीं जागी। आज किसी को कुछ असुरक्षित महसूस नहीं हुआ, जब 30 बच्चों ने दम तोड़ दिया। भाषणों को बढा-चढाकर मिर्च मसाला लगाकर दिखाने वाले चैनलों पर 30 मासूमों की मौत का जिम्मेदार तय नहीं किया गया। आज स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रश्न भी नहीं उठे। कोई वीवीआईपी होता तब उठते शायद। कितना गिर गया है सब कुछ। ऐशो आराम में व्यस्त प्रशासनिक अधिकारी सोए हैं कुम्भकर्णी नींद में, उन्हें क्या उनका बच्चा थोड़े ही था जो अस्पताल प्रशासन पर त्वरित कार्रवाई होती। इन डॉक्टरों को तो भगवान का दर्ज़ा दिया जाता है ना लेकिन आज इन डॉक्टरों के लिए भी जान से ज्यादा पैसे महत्वपूर्ण हो चले हैं। पहले पैसे फिर इलाज, कोई मरता हो तो मरे, इन्हें क्या पड़ी है। उस कम्पनी को भी 69 लाख मुबारक शायद अब 30 बच्चों की मौत से उन्हें 69 लाख मिल जाएँ। कितनी गिर गई है मानवता और संवेदनायें। हे भगवान चोर, डाकुओं और हत्यारों को सद्बुद्धि दे......

जर्नलिस्ट प्रदीप दलाल की कलम से.......

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