Friday, July 20, 2018
Follow us on
Guest Writer

वीआईपी वाली फिलिंग है कि जाती ही नहीं..... वीआईपी कल्चर बोले तो.....नेताजी छोड़ने ही नहीं वाले

प्रदीप दलाल | August 21, 2017 08:23 PM
प्रदीप दलाल



वीआईपी वाली फिलिंग है कि जाती ही नहीं.....

वीआईपी कल्चर बोले तो.....नेताजी छोड़ने ही नहीं वाले

कौन कहता है खत्म हो गया वीआईपी कल्चर

जर्नलिस्ट प्रदीप दलाल की कलम से.....

साहेब आपने पहल की थी वीआईपी कल्चर खत्म करने की लेकिन यह क्या, लाल बत्ती तो उतर गई लेकिन नेताओं के इर्द-गिर्द वही सुरक्षा बल, वही पुलिस वाले और वही चापलूसों का टोला कुछ भी तो नहीं बदला। सीएम की बात ना भी करें तो मंत्री और बड़े अधिकारियों के आगे पीछे आज भी बत्तियों और सायरनों वाली की गाड़ियों का काफिला आम आदमी को मुंह चिढ़ाता साफ दिख जाता है। आज एक नेताजी पहुंचे थे। उन्हें देखकर लगा ही नहीं कि वीआईपी कल्चर खत्म हो गया है। वही लम्बे गाड़ियों के काफिले, वही आगे पीछे सायरनों से शोर मचाती और लोगों की आंखें चौंधियाती पुलिस और अधिकारियों की गाड़ियों का टोला, सब जस का तस तो है। बस मंत्री बिना बत्ती की गाड़ी में थे। रंग बिरंगे कपड़े का कुर्ता पहने मंत्री आते ही अधिकारियों का टोला नेताजी की आवाभगत में पूरी तल्लीनता से लग जाता है। आम आदमी के काम से जी चुराने वाली नौकरशाही व्यवस्था उस समय इतनी तंदुरुस्त दिखती है। मानो वह जनता का कार्य करें ना करें लेकिन मंत्री जी के आगे जी हुजूरी तो बनती ही है। इसके बाद मंत्री जी लोगों की शिकायतें सुनने की बात कहते हैं लेकिन जब दो-चार शिकायतें सुनकर औपचारिकताएं पूरी हो जाती है और अखबारों के लिए फोटो खींच जाती है तो मंत्री जी आराम के लिए बोलते हैं। उनके चापलूस इकट्ठी कर लेते हैं। वह शिकायते कबाड़ के ढेर में तब्दील हो जाती हैं और उसी के साथ ही उन लोगों की उम्मीदें भी दफन हो जाती हैं जिन उम्मीदों और कार्यों को पूरा करने के लिए उन्होंने नेताजी को चुना था। तो आखिर वीआईपी कल्चर में ऐसा बदला ही क्या था। जिसका ढिंढोरा पीटा जा रहा था। जनता के जनप्रतिनिधि होने का दंभ भरने वाले जनप्रतिनिधि अरबों रुपए मात्र मानदेय में ही उड़ा देते हैं और इसके अलावा सुख-सुविधाएं, भत्ते और भी न जाने क्या क्या लेकिन बहुत से नेताओं का इतने भर से भी कहां भरता है तो साहब कोई ना कोई घोटाला ही कर डालते हैं। सीएम, मंत्री, सांसद और विधायक बनने से पहले जो आदमी घर घर जाकर लोगों के हाथ-पैर पकड़ वोट देने के लिए मिन्नते कर रहा था। आज जब वही आम आदमी मंत्री जी से मिलने जाता है तो उसके सुरक्षाकर्मी उन्हें ऐसे रोक देते हैं मानों वह मंत्री से भीख मांग रहा हो। इतना ही नहीं और मंत्री जी के नखरे तो देखिए कि आम आदमी खड़ा-खड़ा देखता रह जाता है और मंत्री जी चलता बनते हैं। गटर साफ करने वाले, झाड़ू मारने वाले, देश सेवा में तैनात सैनिकों की तनख्वाह बढे या ना बढे लेकिन जब बात माननीय नेता जी की सैलरी की आती है तो यह अधिकार उन्होंने खुद को ही दे रखा है कि अपनी तनख्वाह और भत्ते अपने हिसाब से पास करवा सकते हैं। लोक सभा या विधान सभा में तनख्वाह या भत्ते बढ़ाने का बिल क्या रखा वह ध्वनि मत से ही पास हो जाता है जो बिल सबसे ज्यादा जरुरी होते हैं वह बिल में ही खोकर रह जाते हैं। जिओ के सिम का खर्चा ना के बराबर है लेकिन माननीय को फिर भी 10 हजार के करीब टेलीफोन भत्ता मिल जाता है। बिजली निशुल्क, पानी निशुल्क, 25 रुपये में भोजन व्यवस्था, नौकर निशुल्क, पीए निशुल्क, गनमैन निशुल्क, बंगला निशुल्क, इतना कुछ निशुल्क होने के बाद भी इतनी मोटी सैलरी, मोटे भत्ते और सुख सुविधाएं फिर भी हमारे नेता जी इतने गरीब हैं कि पूछो ही मत लेकिन बात जब आम आदमी की आती है तो वह जिये या मरे नेता जी को क्या। नेता जी ने कभी यह नहीं सोचा कि जो वीआईपी कल्चर, जो वीआईपी सुविधाएं उन्हें मिली हुई है। वह इस आम आदमी के खून पसीने की टैक्स की कमाई से ही उन्हें सब मिल रहा है लेकिन उन्हें अब इतना सोचने की फुर्सत कहां। यह वीआईपी कल्चर की आबोहवा ही ऐसी है कि जो एक बार चपेट में आ जाए तो वह कहीं का नहीं रहता। देश में लाखो लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं जिनमें से सैंकड़ों मौत तो भूख से ही होती हैं। जब पेट की आग जीने नहीं देती तो यह लोग मरने में अपने भलाई समझते हैं लेकिन नेता जी अब उसकी आवाज नहीं उठाते। नेता जी को अपनी सैलरी और भत्ते बढ़वाने से फुर्सत मिले तो आम आदमी की आवाज सुनें ना। जिस आदमी के सामने नेता जी कुछ दिन पहले गिड़गिड़ाते नजर आते थे, मिमियाते नजर आते थे। आज वह उन्हीं को आंखें तरेरते नजर आते हैं। देश में कहीं भी बाढ़ सूखा या कोई भी महामारी आए नेता वहां जनता का हाल जानने पहुंचे या ना पहुंचे लेकिन बारी जब राज्यसभा चुनाव या किसी अन्य चुनाव की आती है तो माननीय बड़े फाइव-स्टार होटलों में पहुंच जाते हैं। उन्हें फुर्सत नहीं मिलती तो आम जनता के बीच जाने की, कौन कहता है कि वीआईपी और आम आदमी के बीच की खाई को एक बत्ती ने ढांपने का काम किया है। आखिर कुछ भी तो नहीं बदला और बदलने वाला भी नहीं है जब तक नेताओं की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आएगा और नेताओं की मानसिकता में परिवर्तन लाने के लिए हमें ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजना होगा जो मात्र अपने स्वार्थ सिद्धि नहीं बल्कि जनता के कार्यों मांगो और उनकी उम्मीदों पर खरा उतर सके। ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनना होगा जो जनता के खून पसीने और टैक्स की कमाई का सही सम्मान कर सकें। ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनने के लिए अपना लालच अपने स्वार्थ सिद्धि छोड़नी होगी। चुनावों में शराब, पैसा, गुंडागर्दी और भी अन्य तरह के प्रलोभन बहुत हो चुके, अगर हमें सही मायने में देश को बदलना है तो इन सड़ी गली मानसिकता वाले नेताओं को सबसे पहले बदलना होगा क्योंकि जहां का राजा सही होगा वहां की प्रजा भी सुखी होगी इसलिए हमें शुरुआत करनी होगी ऐसे नेताओं की जो जनता के लिए अपना सर्वस्व लगा दे। जब ऐसे नेता हमारे देश में होंगे तभी मिलेगी हमें वीआईपी कल्चर से आजादी और तभी मिटेगी वीआईपी और आम आदमी के बीच की खाई। जो आज के संदर्भ में बेहद गहरी नजर आती है। जिस दिन अमीर और गरीब के बीच की है खाई मिट गई उस दिन सही मायनो में मिलेगी हमारे देश को आजादी......उसी की उम्मीद में कि अंधेरा छटेगा सूरज निकलेगा....

Have something to say? Post your comment
More Guest Writer News
नक्सलवाद को हराती सरकारी नीतियाँ ,29 मार्च 2018 को सुकमा में 16 महिला नक्सली समेत 59 नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपीएफ के समक्ष आत्मसमर्पण किया
आखिर कहाँ सुरक्षित है बेटिया ? बलात्कार की घटनाओ से शर्मशार होता भारत
क्या भ्रष्टाचार एक चुनावी जुमला है..............
एक्ट में एक ही दिन में ही जांच करके पता लगाया जाए कि आरोप फर्जी है या सही अगर फर्जी पाया जाए तो बेल वरना जेल
उपचुनावों के आधार पर लोकसभा चुनाव आंकना भूल होगी
बैंकों की घुमावदार सीढ़ियां ... !!
न्यूज वल्र्ड के सोमालिया! - यूथोपिया ... !
नीरव मोदी को नीरव मोदी बनाने वाला कौन है
भारत में अभी भी पकौड़े और चाय में बहुत स्कोप है साहब
डूबते सूरज की बिदाई नववर्ष का स्वागत कैसे पेड़ अपनी जड़ों को खुद नहीं काटता,