Wednesday, October 24, 2018
Follow us on
BREAKING NEWS
नीलोखेडी में ज्वैलर्स की गोली मार की हत्या, आरोपी फराररावमावि सतनाली में सडक़ सुरक्षा प्रतियोगिता का हुआ आयोजनवरिष्ठ पत्रकार डॉ. एलसी वालिया का निधनधर्म का आदि स्रोत वेद के सिवाय कोई नहीं, आओ लोट चले पुन: वेदों की ओर: महन्त शुक्राईनाथस्वदेशी दिपावली के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए चलाई मुहिम, बच्चों को दिलाई शपथजींद में 23 वर्षीय विवाहिता ने ट्रेन के सामने कूदकर किया सुसाइड, पति और ससुर पर मामला दर्जअग्रोहा की खुदाई के लिए भारत सरकार से रेजुलेशन पास करवाएंगे- डाॅ चंद्राशिक्षा भारती विद्यालय में बच्चों व शिक्षकों को दिलवाया स्वदेशी दिपावली मनाने का संकल्प
Fashion/Life Style

आखिर दुनिया की सरकारें ओशो से डरती क्यों है ?

अटल हिन्द ब्यूरो | September 08, 2017 06:21 PM
अटल हिन्द ब्यूरो

आखिर दुनिया की सरकारें ओशो से डरती क्यों है ?
"पुराना धर्म अपने आप गिरने को तैयार है, सिर्फ तुम्हारे धक्के देने की जरूरत है। और वह धर्म कोई तुम्हारे बाहर नहीं है, तुम्हारे भीतर का कचरा है। निकाल कर बाहर फेंक दो, वह समाप्त हो जाएगा।"

जो लोग भी अपने जीवन में क्रांति लाना चाहते हैं, सबसे पहले उन्हें यह समझ लेना होगा कि बंधा हुआ आदमी कभी भी जीवन की क्रांति से नहीं गुजर सकता। और हम सारे ही लोग बंधे हुए लोग है। यद्यपि हमारे हाथों में जंजीरें नहीं हैं, हमारे पैरों में बेड़ियां नहीं हैं; लेकिन हमारी आत्माओं पर बहुत जंजीरें हैं, बहुत बेड़ियां हैं। और पैरों में बेड़ियां पड़ी हों, तो दिखायी भी पड़ जाती है, पर आत्मा पर जंजीरें पड़ी हों, तो दिखायी भी नहीं पड़ती। अदृश्य बंधन इस बुरी तरह बांध लेते हैं कि उनका पता भी नहीं चलता। और जीवन हमारा एक कैद बन जाता है। और वे अदृश्य बंधन हैं-सिद्धांतों के, शास्त्रों के और शब्दों के।

प्रश्न: प्यारे भगवान श्री, कल ही मैंने पहली बार आपका प्रवचन सुना। आपमें जो संगम मैंने देखा है, वैसा संगम शायद ही पृथ्वी पर कभी हो। मैंने ऐसा जाना, कि शायद परमात्मा आपे द्वार पहली बार हंसा है।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमने उदासी को, गंभीरता को, आत्म—उत्पीड़न को साधुता समझा है। जो अपने को जितना सताए उतना बड़ा संत हो गया। हमने, जीवन का जिन्होंने विरोध किया है, उनकी पूजा की है। हालांकि हम उनका अनुसरण तो न कर सके, क्योंकि जीवन के विरोध में जाना कुछ आसान नहीं। लेकिन हमने उनकी पूजा करके अपने को विषाक्त जरूर कर लिया।
और आज तक मनुष्य—जाति के इतिहास में एक अत्यंत मूढ़ता से भरा हुआ खेल जारी रहा। हम आदर देते रहे उन लोगों को, जो जीवन से दूर हटते गए। और हमारे आदर के कारण वे जीवन से और भी दूर हटते गए क्योंकि आदर का मजा उनके अहंकार की तख्ती बनता गया। वे सूखकर हड्डियां हो गए। जीवन के सारे रस उन्होंने न केवल छोड़ दिए, बल्कि शिक्षा भी देने लगे कि दूसरे भी छोड़ दे। एक जीवन—निषेधात्मक आंदोलन मनुष्य जाति को अब उनके अहंकार की पूजा हो गयी। और अहंकार सिवाय नर्क के और कुछ नहीं है। और चूंकि उनके जीवन—निषेध ने अहंकार की तृप्ति दी, वे जितनी निंदा हमारी कर सके, क्योंकि हम अब भी जीवन में रस ले रहे थे.....उन्होंने हमारे सारे रस को विषाक्त कर दिया।

मैं निश्चित रूप से ही धर्म को विषाद, आत्म—उत्पीड़न से, स्वयं को सताने से हटाकर आनंद का एक उत्सव बनाना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि जीवन हंसे, और ऐसा हंसे, कि हजार—हजार फूल बरसें।

मैं निश्चित रूप से ही धर्म को विषाद, आत्म—उत्पीड़न से, स्वयं को सताने से हटाकर आनंद का एक उत्सव बनाना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि जीवन हंसे, और ऐसा हंसे, कि हजार—हजार फूल बरसें। जीवन में कुछ भी नहीं जो निंदा को योग्य है। और जीवन में ऐसा कुछ नहीं है जिसे छोड़कर भागने की जरूरत है। हां, जीवन में ऐसा बहुत कुछ है, जो छिपे हुए खजाने की तरह है। या ऐसा है जैसे खदान से निकाला हुआ सोना हो। उसकी सफाई की जरूरत है, उस पर निखार लाना है, उसको चमक देनी है।
और धर्म और जीवन दो विपरीत आयाम न हो बल्कि एक ही संयुक्त धरा हो। धर्म नाच सके, हंस सके, गीता गा सके। धर्म उनकी पूजा में, जिनकी कुल कला अपने को सताने में समाप्त हो जाती है, बंधा हुआ न रह जाए। जिनको तुम संत कहते हो उनके मनोवैज्ञानिक इलाज की जरूरत थी, तुमने उनकी पूजा की है। भविष्य तुम पर हैरान होगा। तुमने विक्षिप्त लोगों की, बजाय चिकित्सा के, उनकी शिक्षाओं को ग्रहण करने की कोशिश की। एक स्वस्थ धर्म, एक स्वस्थ जीवन, विरोधी नहीं हो सकता। वे दोनों एक गाड़ी के पहियों की भांति होंगे। उनमें से एक भी पहिया खो गया तो गाड़ी की गति रुक जाएगी। और अब तक यही हुआ। संतों के हाथ में एक पहिया था, और उनके पूजकों के हाथ में एक पहिया था; तो गाड़ी चली ही नहीं, अटक कर खड़ी हो गयी।
तुम्हारा प्रश्न समुचित है। मेरी चेष्टा यही है कि दोनों पहिए फिर जुड़ जाए और जीवन की गाड़ी फिर गीत गा सके, नाच सके, आह्लादित हो सके। यह अस्तित्व—थोड़ा अपने चारों तरफ तो देखो—इतने फूलों से भरा है। यह सागर—इसकी लहरों को तो देखो। यह आकाश—इसके सितारों को तो देखो। इनमें तुम्हारा एक भी साधु न मिलेगा और एक भी संत न मिलेगा।

मैं तुम्हें इस विराट अस्तित्व के एक अंग की तरह जुड़ा हुआ देखना चाहता हूं, लहरें उठती हुई देखना चाहता हूं। निंदा का स्वर समाप्त हो और निंदा का युग समाप्त हो। दमन की परंपरा समाप्त हो और जीवन का उल्लास हमारा भविष्य बने।<

मैं तुम्हें इस विराट अस्तित्व के एक अंग की तरह जुड़ा हुआ देखना चाहता हूं, लहरें उठती हुई देखना चाहता हूं। निंदा का स्वर समाप्त हो और निंदा का युग समाप्त हो। दमन की परंपरा समाप्त हो और जीवन का उल्लास हमारा भविष्य बने।
जो समझ सकते हैं, वे मेरी बात को प्रेम करेंगे। जो नहीं समझ सकते हैं, वे मेरी बात के दुश्मन हो जाएंगे। और नासमझों की भीड़ है। सुशिक्षित हैं, पढ़े—लिखे हैं, थोथे ज्ञान से भरे हैं, लेकिन समझ की एक जरा सी किरण भी नहीं। सारी दुनिया में घूमकर मैं यह देखने की कोशिश करता रहा, कि जिस आदमी के लिए मैं नया आदमी बनाना चाहता हूं, वह आदमी सुनने को भी राजी नहीं है, कि मेरी बात को दूसरे लोग सुन सकें। यह मेरी पराजय नहीं है, यह उसकी पराजय है।

आज दुनिया के सारे देशों ने अपनी—अपनी पार्लियामेंट में मेरे लिए नियम बनाकर रखा है कि मैं उनके देश में प्रवेश नहीं कर सकता। न मैंने उनके देश में कभी प्रवेश किया है, और न मैंने उनके देश का कोई कानून तोड़े हैं, न मैंने उनके देश के विधान के खिलाफ कुछ किया है। मैं वहां कभी गया ही नहीं। ऐसे—ऐसे देशों की पार्लियामेंट में मेरे खिलाफ उन्होंने नियम बनाया है जिन देशों के नाम भी मैंने कभी नहीं सुने थे।

आज दुनिया के सारे देशों ने अपनी—अपनी पार्लियामेंट में मेरे लिए नियम बनाकर रखा है कि मैं उनके देश में प्रवेश नहीं कर सकता। न मैंने उनके देश में कभी प्रवेश किया है, और न मैंने उनके देश का कोई कानून तोड़े हैं, न मैंने उनके देश के विधान के खिलाफ कुछ किया है। मैं वहां कभी गया ही नहीं। ऐसे—ऐसे देशों की पार्लियामेंट में मेरे खिलाफ उन्होंने नियम बनाया है जिन देशों के नाम भी मैंने कभी नहीं सुने थे। पहली बार ही नाम सुने।
क्या घबराहट है? कैसी घबराहट है? और तुम्हारा देश है, तुम्हारी भीड़ हैं, मैं अकेला आदमी हूं। अगर मैं गलत हूं तो मुझे गलत कहो, और अगर मैं सही हूं तो कम से कम इतनी निष्ठा तो अपनी बुद्धि की दिखाओ, कि सत्य को स्वीकार करो। लेकिन वहीं अड़चन है। उनको भी दिखायी पड़ रहा है कि उनके पैरों के नीचे जमीन नहीं है। और वे नहीं चाहते कि कोई आदमी आकर उनको बताए कि तुम्हारे पैरों के नीचे जमीन नहीं है। उनको भी मालूम हो रहा है कि वे तिनकों के सहारे बचने की कोशिश कर रहे हैं। और इसलिए घबराहट होती है कि कोई आदमी आकर कहीं यह न कह दे, कि यह तुम क्या कर रहे हो? यह तिनकों के सहारे तुम बच न सकोगे। इन तिनकों को भी ले डूबोगे।
दुनिया का यह चक्कर मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा। और भी चक्कर मैं जारी रखूंगा क्योंकि सरकारें बदलेंगी, पार्लियामेंट बदलेंगी.....और मेरे संन्यासी हर पार्लियामेंट में तय किए गए नियमों के खिलाफ अदालतों में मुकदमे लड़ रहे हैं। क्योंकि इससे ज्यादा बेहूदी कोई बात नहीं हो सकती कि एक आदमी जो कभी तुम्हारे देश में ही न आया हो, उस पर तुम किस इल्जाम में देश में आने पर रुकावट डाल सकते हो? मगर उनकी मुसीबत मैं समझता हूं। क्योंकि बुद्ध कभी बिहार के बाहर नहीं गए, मोहम्मद ने कभी रब नहीं छोड़ा। उपनिषद के ऋषि अपने—अपने गुरुकुलों में निवास किए। नहीं तो उन सबको इन्हीं तकलीफों का सामना करना पड़ता।
इस अर्थों में मैं एक नए युग का आरंभ कर रहा हूं। अब जिस व्यक्ति को भी सत्य की बात करनी हो, उसे पूरी मनुष्य—जाति के समक्ष अपने सत्य को पेश करने की चेष्टा करनी चाहिए। उसी चेष्टा में बहुत कुछ निश्चित हो जाएगा।
सारी दुनिया के देश आने को लोकतंत्र सिद्ध करते हैं और बोलने की स्वतंत्रता को बहुत बड़ा आदर देते हैं। और मैं उनसे कुछ और नहीं मांग रहा था, और कुछ हमेशा के लिए रहने के लिए नहीं मांग रहा था। तीन सप्ताह किसी देश में बोलने का हक चाहता था। और वे इतनी भी हिम्मत न जुटा सके, कि तीन सप्ताह मुझे सुन सकते। साफ है, कि जाने—अनजाने उन्हें अपनी कमजोरी का भलीभांति पता है। यह भी साफ है कि मैं तीन सप्ताह में उनके दो हजार वर्षों में बनाए गए नियमों, धर्मों, नैतिकताओं को मिट्टी में मिला सकता हूं। क्योंकि उनमें कोई प्राण नहीं है। और यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह वे खुद ही स्वीकार कर रहे हैं।
यूनान में एक युवा संन्यासिनी ने—जो कि प्रेसिडेंट के बहुत करीब है, और जिसने प्रेसिडेंट को चुनाव में जिताने में हर तरह से कोशिश की है—क्योंकि संन्यासिनी एक अभिनेत्री है और उसका प्रभाव है यूनान में—उसने प्रेसिडेंट को मुझे चार सप्ताह के लिए यूनान प्रवेश के लिए राजी कर लिया। यूनान के सबसे बड़े फिल्म डाइरेक्टर के पास एक बहुत सुंदर और बहुत प्राचीन, समुद्र के किनारे बना हुआ महल है। उस महल में मैं दो सप्ताह रहा। मैं तो महल के बाहर गया भी नहीं। लेकिन दो सप्ताह के भीतर यूनान के चर्च की जड़ें कैसे हिलने लगीं, यह भी मेरी समझ में न आया। क्योंकि मैं यूनानी भाषा नहीं बोलता। और जो लोग मुझे सुनने आते थे उस महल में, उनमें यूनानियों में सिर्फ मेरे संन्यासी थे, जो कि मुझे सुन ही चुके थे और मेरे संन्यासी थे। और, या यूरोप से अलग—अलग देशों से और संन्यासी आए थे। उनको भी बिगाड़ने का कोई सवाल न था, मैं उन्हें बिगाड़ ही चुका था।
यूनान के आर्च बिशप ने धमकी दी प्रेसिडेंट को, कि अगर मुझे इसी समय—दो सप्ताह वहां रहने के बाद, इसी समय—अगर यूनान के बाहर नहीं किया जाता, तो जिस महल में मुझे रखा गया है और जहां और बहुत से संन्यासी ठहरे हुए हैं, हम उस महल को उन सारे लोगों के साथ जिंदा जला देंगे। ये बीसवीं सदी के हैं! और ये ईसाइयत के वचन हैं। और ईसाइयों का सब से बड़ा पुरोहित यूनानी है। और चर्चों में शिक्षाएं दी जाती रहेंगी कि अपने दुश्मन को प्रेम करो। और जो तुम्हारे गाल पर एक चांटा मारे, तुम उसे दूसरा गाल भी दे दो।
मैंने यूनान के प्रेसिडेंट को खबर भेजी, कि अभी मैंने पहला चांटा भी नहीं मारा। रही दुश्मनी का बात; मैं इस आदमी को जानता भी नहीं। दोस्ती भी नहीं है, दुश्मनी तो दूर। और जिंदा जला देने की बात उन लोगों के मुंह से, जो ईसा को सूली पर चढ़ा देने का इतना विरोध करते रहे हैं दो हजार साल तक, शोभा नहीं देती। और वह भी उस आदमी को, जिसने न यूनान में भ्रमण किया है, न लोगों को कुछ कहा है, न तुम्हारे चर्चों में गया है, न कोई उपद्रव किया है। लेकिन राजनीतिज्ञ राजनीतिज्ञ हैं, उनकी घबराहटें उनकी हैं।
मुझे उसी वक्त यूनान छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। मैं सो रहा था दोपहर को मुझे सोते में गिरफ्तार किया गया। एक युवती जो मेरी सेक्रेटरी थी यूनान में, उसने कहा कि कम से कम मुझे उठा देने दो। वे अपना हाथ—मुंह धो लें, कपड़े बदल लें, तो उसे धक्के मारकर, सड़क पर घसीट कर, कार में लादकर पुलिस स्टेशन भेज दिया। और जब मैं उठा, तो मेरी कुछ समझ में न आया कि बात क्या है, हो क्या रहा है? क्योंकि सारा मकान पुलिस से घिरा है, और पुलिस के लोग बड़ी—बड़ी चट्टानों को उठाकर सदियों पुरानी कीमती खिड़कियों को फोड़ रहे हैं, दरवाजों को तोड़ रहे हैं। मैं ऊपर की मंजिल पर था। मुझे तो ऐसा लगा कि जैसे कोई नीचे बम फोड़ रहा हो। तुम्हारे पास मुझे गिरफ्तार करने का कोई वारंट है? न उनके पास कोई वारंट है, न मकान में प्रवेश का कोई वारंट है। उनमें से सिर्फ एक ने कहा कि हमारे पास कुछ भी नहीं है सिवाय इसके, कि प्रेसिडेंट का फोन है, कि मुझे इसी वक्त यूनान की जमीन के बाहर कर दिया जाए। क्योंकि हम आर्च बिशप की धमकी से भयभीत हैं। इलेक्शन करीब हैं, और अगर ईसाई विरोध में हो गये, तो हमारी पार्टी का जीतना मुश्किल है।
लोगों को न सत्य से मतलब है, न असत्य से मतलब है; न आदमी से मतलब है, न उसकी आदमियत से मतलब है। रास्ते में मुझे एयरपोर्ट ले जाते वक्त उन्होंने कागजात दिए, जिनमें वे मुझसे दस्तखत कराना चाहते थे। उन कागजों में यह लिखा हुआ था कि मैं यूनान से निष्कासित किया जा रहा हूं, क्योंकि मेरी उपस्थिति यूनान में यूनान के धर्म, नैतिकता,उसकी परंपराएं, उसकी संस्कृति के लिए खतरा है।
मैंने उनसे कहा कि यह मेरे लिए सर्टिफिकेट है। तुम दो हजार सालों में जिन चीजों को बना पाए हो, उन्हें अगर मैंने दो सप्ताह में खत्म कर दिया हो, और दो सप्ताह और बचे हैं मेरे, तो तुमने जो बनाया है वह रेत का महल है। मैं फिर लौटकर आऊंगा। क्योंकि जो ची इतनी सड़ी—गली है, कि उसके ठेकेदार उसके मिटने से इतने डरे हुए हैं, उस सड़ी—गली चीज को मिटा देना ही अच्छा है।
जिस गांव, निकोलस नाम के द्वीप पर मैं ठहरा था, उस गांव के लोगों ने खबर भेजी, कि हम क्या कर सकते है? हम गरीब लोग हैं। मैंने उनसे कहा कि तुम सब कम से कम इतना कर सकते हो, कि निकोलस के सारे लोग एयरपोर्ट पर मुझे विदा देने को इकट्ठे हों, ताकि आर्च बिशप को यह पता चल जाए कि कौन आर्च बिशप के साथ है और कौन मेरे साथ है। हालांकि तुम मुझे नहीं जानते, और न ही तुम मुझे पहचानते हो, न ही तुमने मुझे सुना है।
मैं खुद भी चकित हुआ। पुलिस के लोग चकित हुए। क्योंकि निकोलस की पूरी आबादी: तीस हजार लोग एयरपोर्ट पर मौजूद थे, और केवल छह बूढ़ी औरतें चर्च में मौजूद थीं४ और चर्च में विजय की घंटियां बजायी जा रही थीं, क्योंकि निकोलास के चर्च के अधिकारियों को खबर दी गयी थी, कि जब मुझे निष्कासित किया जाए, तो यह एक बड़े विजय की बात समझी जाए, कि हमने एक संस्कृति, धर्म और हमारी परंपराओं के दुश्मन को पराजित कर दिया। मैंने पुलिस के प्रधान को कहा, कि तुम थोड़ा अपने आर्च बिशप को जाकर कहना कि ये छह बूढ़ी औरतें—और हो सकता है ये सभी खरीदी हुई हों—और नगर के तीन हजार लोग एयरपोर्ट पर मुझे विदा दे रहे हैं, और उन घंटियों पर हंस रहे हैं। उनसे कह देना कि इन छह औरतों के बलबूते पर तुम चर्च को टिका न सकोगे। यह चर्च गिर गया।
पुराना धर्म अपने आप गिरने को तैयार है, सिर्फ तुम्हारे धक्के देने की जरूरत है। और वह धर्म कोई तुम्हारे बाहर नहीं है, तुम्हारे भीतर का कचरा है। निकाल कर बाहर फेंक दो, वह समाप्त हो जाएगा। और एक ऐसे धर्म की घोषणा होनी जरूरी है जो गीत गा सकता हो, जो हंस सकता हो, जो आनंदित हो सकता हो, जो जीवन का रस ले सकता हो। अगर परमात्मा को जीवन को बनाए रखने में रस है, तो उन महात्माओं को रोकना ही होगा, जो जीवन के विरोध में विष फैलाने की कोशिश कर रहे हैं |
~ओशो.
[ कोपलें फिर फुट आई.प्रवचन-7 ]

 
 
 
 
Have something to say? Post your comment