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प्रेमीयो मे तो एकदुसरे को झुकाने कि होड सी लगी रहती है,ये बडाही विकृत प्रेम है

राजकुमार अग्रवाल | November 19, 2017 02:07 PM
राजकुमार अग्रवाल

"प्रेमीयो मे तो एकदुसरे को झुकाने कि होडसी लगी रहती है।ये बडाही विकृत प्रेम है।
प्रेमीयो मे तो एकदुसरे को झुकाने कि होडसी लगी रहती है।ये बडाही विकृत प्रेम है।सारी दुनिया मे ऐसे प्रेम का देह व्यापार,खरीद फरोख्त चल रही है।"
"इसी कारण दुनिया हिंसा,आतंक,द्वेष मे डुबी हुयी है,हमने मुल को विषाक्त कर दिया है और उसे ही सिंच रहे है।"
अहंकार बड़ा अदभुत है! अहंकार यह भी मानने को तैयार नहीं कि मैं नासमझ! ध्यान तो नासमझों के लिए है। मैं कोई नासमझ तो हूं नहीं जो ध्यान करूं। और इतने समझदार भी तुम नहीं हो कि बिना ध्यान किए पहुंच जाओ। तब तुम अड़चन में पड़ोगे। तब तुम्हारी बेचैनी बड़ी गहरी हो जाएगी। तुम टूटोगे। तुम खंड—खंड हो जाओगे।
अष्टावक्र कहते हैं : सब ध्यान, सब विधियां व्यर्थ हैं, क्योंकि कर्म —मात्र वहा नहीं पहुंचा सकता; वहा तो केवल होश पहुंचाता है। ध्यान भी करोगे तो कृत्य होगा। ध्यान भी करोगे तो कर्ता बन जाओगे। तो भोजन पकाओ कि बुहारी लगाओ कि दूकान चलाओ कि ध्यान करो, फर्क नहीं पड़ता—कुछ करते हो। अष्टावक्र यह कह रहे हैं कि तुम्हारा जो स्वभाव है, वहां कर्म नहीं पहुंचता; वहा तो सत्ता मात्र है। वह जो बुहारी लगाना हो रहा है, उसमें तुम नहीं हो; वह जो बुहारी लगाने को देख रहा है,वही तुम हो। भोजन पकाते हो, भोजन पकाने में तुम नहीं हो; वह जो भोजन को पकते देख रहा है और देख रहा है कि तुम भोजन पका रहे हो,वही तुम हो। यही बात ध्यान में है। ध्यान में तुम नहीं हो; वह जो देख रहा है कि ध्यान कर रहे हो, वह जो देख रहा है कि ध्यान से शांति आ रही, वह जो साक्षी है—वही तुम हो।
Osho
Zorba The Buddha

मानवीय हो आत्मीयता है,प्रेम से सराबोर हो,अपने पण का भाव हो,तो ये विरह,संताप,दुःख देने कि किसी को आजमाने कि संदेह कि मानवी दृष्ट प्रवृति काम कर नहीं सकती।जीवन सरल निष्कपट बच्चे जैसा होता ही है।

प्रेमीयो मे तो एकदुसरे को झुकाने कि होडसी लगी रहती है।ये बडाही विकृत प्रेम है।सारी दुनिया मे ऐसे प्रेम का देह व्यापार,खरीद फरोख्त चल रही है।
इसी कारण दुनिया हिंसा,आतंक,द्वेष मे डुबी हुयी है,हमने मुल को विषाक्त कर दिया है और उसे ही सिंच रहे है।


सारी दुनिया मे ऐसे प्रेम का देह व्यापार,खरीद फरोख्त चल रही है।" "इसी कारण दुनिया हिंसा,आतंक,द्वेष मे डुबी हुयी है,हमने मुल को विषाक्त कर दिया है और उसे ही सिंच रहे है।"

लेकिन हम जैसे है वैसे ही सब तरफ देखते है।

इसलिए सुक्ष्म तरीकोे से मुर्छा मे अंहकार अपना काम करता है।इसे ध्यान और समझ पुर्वक जीया जाय,समझा जाय तो ही हम दुसरो के प्रति करुणा वान हो सकते है।

कहते है ना वह बात दुसरो के लिए न करे जो आपके लिए कोई और करें तो आपको अच्छी ना लगे।

जब आप किसी के लिए भी सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं तो वह आपको बहुत हल्के में लेने लगता है साथ ही अपमानित करना भी शुरू कर देता है ।

आपके आत्म सम्मान से खेलने में उसका अहंकार पुष्ट होता है ।

और जब आप उस पहली नकारात्मक घटना को चुपचाप यह सोच कर सह लेते हैं कि कहीं परिस्थिति न बिगड़ जाये , हंगामा न हो जाय या एक ही बार की तो बात है ।
तो यह समझ लीजिये कि जिस घटना के आरम्भ में ही इतनी तकलीफ है आपका उसको सहन करके उसे दोबारा घटने के लिए आमंत्रित करना कितना खतरनाक होगा और फिर हर बार सहते जाना कितना नारकीय होगा ।


भोजन पकाओ कि बुहारी लगाओ कि दूकान चलाओ कि ध्यान करो, फर्क नहीं पड़ता—कुछ करते हो। अष्टावक्र यह कह रहे हैं कि तुम्हारा जो स्वभाव है, वहां कर्म नहीं पहुंचता; वहा तो सत्ता मात्र है।<

पहले दिन तो हल्का विरोध ही करना पड़ेगा किंतु यदि आप सहते गये तो आगे जब भी विरोध करेंगे उन घटनाओं का तो वह पहले घटी घटना की बात कह कर कि पहले तो तकलीफ नहीं हुयी थी अब ऐसा क्या हो गया ...उलाहना देगा ।

ऐसे परिस्थितियाँ आपके लिये पहले दिन की अपेक्षा ज्यादा जटिल होती जाएँगी....... प्रतिपक्ष भी पहले दिन के विरोध को आपकी हिम्मत के खाते में दर्ज़ करेगा किंतु यदि आपने एक या अधिक बार गलत सह लिया तो फ़िर आपके प्रतिकार को दु:साहस समझ दबाने की चेष्टा करेगा ।

#ध्यान रखें जिस चीज को आप एक बार होने देंगे वह फिर बार - बार होगी और पहले से ज्यादा होगी ।

और देखिये न कि जब सामने वाले को आपकी तकलीफ का , आपके दर्द का जरा भी एहसास नहीं हो रहा उसे केवल अपना ही सुख दिखाई दे रहा है तो वह कैसे आपका अपना हुआ ...?

जिसे आपका दुःख समझना चाहिए या बाँटना चाहिए वही आपको दुःख पहुंचा रहा है तो वह कैसे अपना हुआ ?

संसार की औपचारिकता पूरी कर देने भर से कोई किसी का अपना नही बन पाता है ।

जो भी बात , घटना या क्रिया आपके आत्मसम्मान को , आपकी आत्मा को ठेस पहुंचाती है उसे पहली ही बार में जोरदार विरोध के साथ खत्म कर दें , उसे सहन करने के लिए खुद को समझायें नहीं ।


जो भी बात , घटना या क्रिया आपके आत्मसम्मान को , आपकी आत्मा को ठेस पहुंचाती है उसे पहली ही बार में जोरदार विरोध के साथ खत्म कर दें , उसे सहन करने के लिए खुद को समझायें नहीं ।

भले ही आपका कोई कितना ही प्रिय या निकट का क्यों न हो ।

यदि आपके साथ ज्यादती करके सामने वाले को ख़ुशी मिलती और आप उसकी ख़ुशी के लिए अपने आत्मा की हत्या करने को तैयार हो जाते हैं तो समझ लीजिये कि आप अपने जीवन का सबसे ग़लत और गन्दा फैसला किये हैं ।

हाँ , इसके सुधार के लिए जब आप दृढ संकल्पित होकर खड़े हो जायेंगे तो सामने वाला थोड़ा विरोध या ना नुकुर के बाद अपने आपको बदलने के लिए तैयार हो जायेगा ।

जिस दिन आप अपने आत्म सम्मान को महत्व देना शुरू कर देंगे उस दिन से सामने वाला भी आपकी कद्र करना शुरू कर देगा ।

यदि आत्मसम्मान को बेचकर या अपनी आत्मा को घायल करके संसार का कुछ भी प्राप्त हो रहा हो वह व्यर्थ ही है ।

थोड़ी सी तो जिंदगी है , उसको भी इतनी नारकीयता में जीने का क्या अर्थ है और मृत्यु तो सब को आनी है इसलिए डरकर भी जीने का क्या अर्थ है ।

इससे ज्यादा आपका भला कोई और क्या बिगाड़ सकता है ।

जो आत्मसम्मान के साथ जीते हैं वही "जीवित" हैं , आत्मग्लानि में जीने वाले तो "जिन्दा लाश" हैं ।

इसलिए यदि आप ऐसी परिस्थितियों में जी रहे हैं तो आज से ही हिम्मत कीजिये और उससे उबरने का प्रयास कीजिये ।

यदि आप विरोध नहीं दर्शा सकते हैं तो उससे मौन और उदासीन हो जाएँ ।
आपके अलावा आपके जीवन में किसी और का बिल्कुल भी अधिकार नहीं हैं बस जब आप अपने जीवन को महत्व न देने वाले दीन - हीन और सामने वाले पर आर्थिक या भावनात्मक रूप से निर्भर दिखाई देते हैं तो कोई भी आपको अपने अधिकार में लेने का प्रयास करता है ।

आप जैसा जीवन चाहें , वैसा जिएँ क्योंकि परमेश्वर ने या कुदरत ने किसी के साथ अन्याय नहीं किया है , किसी को कम या ज्यादा नहीं दिया है ।

इस जगत और जगह के संसाधनों में आपका भी उतना ही अधिकार है जितना की अन्य सबका ।

बस आप अपनी सामर्थ्य पर संदेह करना और दूसरे की दया में , सुरक्षा में पलने की मनःस्थिति से बाहर आ जाएँ ।

बस एक बार अपने संदेहों और कल्पित भय से उबर जाएँ और देखेंगे कि सब अच्छा होने लगेगा

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