Sunday, September 23, 2018
Follow us on
BREAKING NEWS
बारड़ा गांव के पावर हाउस सहित विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर चलाया पौधारोपण अभियानसमाज में प्रेरणा की मिसाल बनकर उभरा नंगलमाला का युवा समाजसेवी ओमशिव कौशिक25 सितंबर को भारी संख्या में प्रदेश के कोने-कोने से लोग होंगे शामिल: लम्बोरापाली के बाबा सिद्ध मंदिर में खेलकूद प्रतियोगिताएं आयोजितकेजरीवाल बदलेंगे कानून,शहीद जवान को केजरीवाल सरकार देगी एक करोड़ व परिवार को सरकारी नौकरीहमारा वतन एनजीओ ने रेलवे स्टेशन पर लगवाए डस्टबिनएकादशी के उपलक्ष्य में गौशाला में लगाई सवामनीपाक ने घायल भारतीय जवान को अगवा कर 9 घंटे तड़पया;गला रोता,टांग काटी आंख निकाली करंट लगाकर गोली मारी
Fashion/Life Style

ओशो का सम्मोहन, नशा या पागलपन

राजकुमार अग्रवाल | January 19, 2018 01:25 PM
राजकुमार अग्रवाल

ओशो का सम्मोहन, नशा या पागलपन
_______
तीन साल ओशो के मौन के बाद ओशो जब पहली बार अपने जन्म दिन पर समागम आये। उस समय दुनियां भर से 10,000 लोग वहां एकत्रित हुए थे।
ओशो उस समय भी मौन में थे।ओशो आकर अपनी कुर्सी पर बैठे, चारों और पागल मदमस्त लोग। जो केवल झूम रहे थे।ओशो ने एक शब्द भी नहीं बोला। और तीन घंटे तक लोग पागलों की तरह मंत्र मुग्ध ओशो को पीते रहे।
राजनैतिक और बुद्धिजीवी और मीडिया इस घटना से डर गई कि हम तो चीख-चीख कर भी बोलते है तब भी लोग इतने
सम्मोहित नहीं सुनते जरूर ये लोग पागल
हो गये है। और लगता है अब जिम जोंस
की दुर्घटना फिर दोहराई जायेगी।
परंतु जिम जोंस, हिटलर, मुसोलनी, या जार में गुणात्मक भेद था ओशो में, ओशो लोगों को सामूहिक जागरण दे रहे थे। उन्हे जगा रहे थे। ध्यान एक जागरण है। वह बेहोशी को तोड़ रहे थे।
वे लोगो को बंधन में बाध नहीं रहे थे उन्हें
मुक्ति दे रहे है। ये तो इसी तरह से हुआ की ध्यान भी एक नशा देता है। और शराब भी एक नशा। नाम ख़ुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।
ध्यान का नशा जागरण देता है। वह आपके अचेतन की पर्तों को प्रकाशित कर रहा है। और शराब क्या कर रही है। आपके चेतन मन को भी बेहोश कर रही है।आप के पास जो चेतन मन का एक हिस्सा जागा हुआ है उसे भी सुला देती है। आप एक पशु तुल्य हो जाते है। जिस का मन सोया हुआ
है। मन सक्रिय और सजग में बहुत भेद है।
पशु का मन सक्रिय तो है पर सजग नहीं है। इस तरह से हमारे मन के 9 भाग अचेतन के सोये और एक हिस्सा ही जागा है। शराब इस तरह से मनुष्य को समरस कर जाती है। बीच में जो एक
हिस्सा जाग है उसे सुला देती है। कोई
भेद नहीं रहा। और ध्यान अचेतन
को जगाना शुरू कर देता है, आपके अंधेरे कमरे धीरे-धीरे प्रकाशमय होने शुरू
हो जाते है।
ओशो लोगों को सामूहिक जागरण दे रहे
थे, जिन जोंस जैसे व्यक्ति लोग को सामूहिक नींद दे रहे है। एक सम्मोहन दे रहे है। एक गुलामी दे रहे है।
काश ध्यान का रस बुद्धि जीवी वर्ग
ने चखा होता तो। ओशो के काम को इस तरह से विध्वंस न किया गया होता। जो न कभी होगा न किसी में वो कार्य करने का सामर्थ्य है।
शायद शिव के विज्ञान भैरव तंत्र के बाद कोई अगर ध्यान की नई विधि कोई व्यक्ति संसार को दे पाया तो वह मात्र ओशो है। आप इस से समझ सकते है कि ओशो किस हस्ती के व्यक्तित्व अपने में समेटे थे।
हम आने वाले 5000 साल बाद
ही ओशो को समझने लायक बुद्धि विकसित कर सकेंगे। हम अभागे है बुद्ध वक्त से पहले आ जाते है। और कोई जब उन्हें देख कर उनके प्रेम में पड़ता है तो भीड़ उसे पागल समझती है। वह समझती है मुझे कुछ नहीं हो सकता तो इन्हें कैसे हो सकता है। ये जरूर सम्मोहित हैं...।
ओशो

Have something to say? Post your comment