Sunday, March 24, 2019
BREAKING NEWS
10 के सिक्के नहीं लेने पर एफआईआर—-आरबीआई के टोल फ्री नंबर 144040फरीदाबाद पहुंचे प्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त -लोकसभा चुनाव को लेकर अधिकारियों के साथ की समीक्षा दो दिवसीय वॉलीवाल प्रतियोगिता के पहले दिन लडकियों की प्रतियोगिता करवाईजिला अस्पताल में पड़पते आदमी की आवाज बनी कमला यादव, लेकिन उसके बाद क्या ?कुताना--शवों को रखकर धरना-प्रदर्शन करते हुए रिफाइनरी अधिकारियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी कीविकास उर्फ पिंटू हत्याकांड :- आज तक भी नही थमे परिजनों के आंसू, रो-रोकर पत्नी का भी हाल बेहालहर व्यक्ति में देश के प्रति सच्चा जनून होना चाहिए :-राजेश वशिष्ठ कुलदीप बिश्रोई की गैर-मौजूदगी सेचली भाजपा में जाने की चर्चाएंलिंग जांच की सूचना दे, दो लाख का ईनाम लेबिना दहेज केवल 1 रुपया लेकर भाजपा नेत्री के बेटे ने कर ली शादी

Guest Writer

उपचुनावों के आधार पर लोकसभा चुनाव आंकना भूल होगी

March 18, 2018 01:37 PM
डॉ नीलम महेंद्र

उपचुनावों के आधार पर लोकसभा चुनाव आंकना भूल होगी


19 मार्च को योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूर्ण कर रहे है। भारी बहुमत, जनता की अपेक्षाओं और आशीर्वाद के बीच यूपी के मुख्यमंत्री बनने के ठीक एक साल बाद अपने प्रदेश के दो लोकसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में इस प्रकार के नतीजों की कल्पना तो योगी आदित्यनाथ और भाजपा तो छोड़िये देश ने भी नहीं की होगी।
वो भी तब जब अपने इस एक साल के कार्यकाल में उन्होंने तमाम विरोधों के बावजूद यूपी के गुंडा राज को खत्म करने और वहाँ की बदहाल कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एन्काउन्टर पर एन्काउन्टर जारी रखे। यहाँ तक कि एक रिपोर्ट के अनुसार एक बार 48 घंटों में 15 एन्काउन्टर तक किए गए।
वादे के अनुरूप सत्ता में आते ही अवैध बूचड़खाने बन्द कराए। अपनी पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों के ॠण माफी की घोषणा की। लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए ऐन्टी रोमियो स्कवैड का गठन किया। अपनी सरकार में वीआईपी कल्चर खत्म करने की दिशा में कदम उठाए । यूपी के पेट्रोल पंपों पर चलने वाले रैकेट का भंडाफोड़ किया। प्रदेश को बिजली की बदहाल स्थिति से काफी हद तक राहत दिलाई। परीक्षाओं में नकल रुकवाने के लिए वो ठोस कदम उठाए कि लगभग दस लाख परीक्षार्थी परीक्षा देने ही नहीं आए। लेकिन इस सब के बावजूद जब उनके अपने ही संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव के परिणाम विपरीत आते हैं तो न सिर्फ यह देश भर में चर्चा का विषय बन जाते हैं बल्कि सम्पूर्ण विपक्ष में एक नई ऊर्जा का संचार भी कर देते हैं। शायद इसी ऊर्जा ने चन्द्र बाबू नायडू को राजग से अलग हो कर मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए प्रेरित किया। खास बात यह है कि भाजपा की इस हार ने हर विपक्षी दल को भाजपा से जीतने की कुंजी दिखा दी, "उनकी एकता की कुंजी"।
भाजपा के लिए समय का चक्र बहुत तेजी से घूम रहा है। जहाँ अभी कुछ दिनों पहले ही वाम के गढ़ पूर्वोत्तर के नतीजे भाजपा के लिए खुश होने का मौका लेकर आए, वहीं उत्तरप्रदेश और ख़ास तौर पर गोरखपुर के ताजा नतीजों के अगले कुछ पल उसकी खुशी में  कड़वाहट घोल गए।  इससे पहले भी भाजपा अपने ही गढ़ राजस्थान और मध्यप्रदेश के उपचुनावों में भी हार का सामना कर चुकी है। सोचने वाली बात यह है कि इस प्रकार के नतीजे क्या संकेत दे रहे हैं?
हालांकि एक या दो क्षेत्रों के उपचुनाव के नतीजों को पूरे देश के राजनैतिक विश्लेषण का आधार नहीं बनाया जा सकता लेकिन फिर भी यह नतीजे कुछ तो कहते ही हैं। कहने को कहा जा सकता है कि भाजपा का पारम्परिक वोटर वोट डालने नहीं गया और इसलिए कम वोटिंग प्रतिशत के कारण भाजपा पराजित हुई लेकिन हार तो हर हाल में हार ही होती है और उसे जीत में बदलने के लिए अपनी हार और अपने विरोधी की जीत दोनों  का ही विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता है।
उत्तर प्रदेश की ही बात लें। क्या दो लोकसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की जीत उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता का संकेत है? जी नहीं, खुद अखिलेश इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी इस जीत में बसपा के वोटबैंक का पूरा योगदान है और वह अकेले अपने दम पर इसे हासिल नहीं कर सकते थे।
दरअसल बात भाजपा प्रत्याशियों के हारने की नहीं  उनकी हार में छिपे उस संदेश की है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अपनी  छोड़ी सीट इसलिए हार गए क्योंकि वे अपने ही संसदीय क्षेत्र के लोगों का दिल नहीं जीत पाए।
बात समाजवादी पार्टी और बसपा के गठबंधन की जीत की नहीं इस जीत में छिपे उस संदेश की है कि आज भी "जाति की राजनीति" के आगे "भ्रष्टाचार और विकास" कोई मुद्दा नहीं हैं। यह न सिर्फ कटु सत्य है किन्तु दुर्भाग्य भी है कि इस देश में आज भी विकास पर जाति हावी हो जाती है। सत्ता के लालच के लिए जाति और वोट बैंक के गणित के आगे सभी दल अपने आपसी मतभेद, मान अपमान के मुद्दे और दुशमनी तक भुलाकर एक हो जाते हैं। जैसा कि अभी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करने के लिए लोकसभा में वो सभी दल एक जुट हो गए जो राज्यों में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। जैसे आंध्र की वाईएसआर काँग्रेस पार्टी और तेलुगू देसम और पश्चिम बंगाल की तृणमूल काँग्रेस और माकपा।
देश की राजनीति और लोकतंत्र के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है कि ये सभी विपक्षी दल देश की जनता के सामने देश हित की कोई स्पष्ट नीति अथवा ठोस विचार रखे बिना केवल मात्र स्वयं को एकजुटता के साथ प्रस्तुत करके भी अपने अपने वोट बैंकों के आधार पर आश्चर्य जनक परिणाम प्राप्त कर लेते हैं।
लेकिन वोटिंग प्रतिशत और जाति गत आँकड़ों का विश्लेषण करके सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोजने वाले यह विपक्षी दल चुनावी रणनीति बनाते समय यह भूल जाते हैं कि देश का वोटर आज समझदार हो चुका है। वो उस ग्राउंड रिपोर्टिंग को नजरअंदाज करने की भूल कर रहे हैं कि देश की जनता भाजपा के स्थानीय नेताओं और ढुलमुल रवैये से मायूस है जो इन नतीजों में सामने आ रही है लेकिन "मोदी ब्रांड" पर उसका भरोसा और मोदी नाम का आकर्षण अभी भी कायम है।
आज  चुनाव जीतने के लिए वोटर  और जातिगत आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका मनोविज्ञान समझना और उससे जुड़ना है। और इसमें कोई दोराय नहीं कि आज भी देश के आम आदमी के मनोविज्ञान और भरोसे पर मोदी ब्रांड की पकड़ बरकरार है। जब बात देश की आती है तो इस देश के आम आदमी के सामने आज भी मोदी का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए चुनावी पंडित अगर वोटर के मनोवैज्ञानिक पक्ष को नजरअंदाज करेंगे तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। आगामी लोकसभा चुनावों की बिसात बिछाते समय विपक्ष इस बात को न भूले कि  "ये पब्लिक है ये सब जानती है"।

Have something to say? Post your comment