भाजपा ने दिवाली को नफ़रत के त्योहार में बदल दिया है
भाजपा ने दिवाली को नफ़रत के त्योहार में बदल दिया है
भाजपा ने दिवाली को नफ़रत के त्योहार में बदल दिया है
BY सिद्धार्थ वरदराजन
भाजपा ने दिवाली को नफ़रत के त्योहार में बदल दिया है
तेजस्वी सूर्या सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से सांसद हैं. बेहद ही दूषित, घृणित और कट्टर मानसिकता वाले सूर्या ने पिछले साल एक ट्वीट किया था कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन आतंकवादी का निश्चित तौर पर धर्म होता है और ज्यादातर मामलों में यह इस्लाम होता है.’ इस ट्वीट को उनकी ही सरकार द्वारा इतना अधिक भड़काऊ माना गया था कि ट्विटर ने इसे हटा दिया था.

 

इस बार बीते हफ्ते सूर्या ने कपड़े बेचने वाली कंपनी फैब इंडिया के इस दिवाली पर बनाए एक विज्ञापन पर आपत्ति जता दी. इस विज्ञापन में फैब इंडिया ने उर्दू भाषा के एक मुहावरे ‘जश्न-ए-रिवाज़’ का प्रयोग किया है. सूर्या को इसी पर आपत्ति है. इसका अनुवाद ‘परंपराओं का उत्सव’ होता है. हालांकि, परंपरा के लिए सही शब्द का उच्चारण ‘रवाज’ होना चाहिए, न कि ‘रिवाज़’.
बहरहाल, इस भाजपा नेता के ट्वीट में ऐसी कई बातें हैं जो शर्मनाक और घृणास्पद हैं. पहला तो भाषा (उर्दू) और धर्म (‘अब्राहमीकरण’) के बीच निकाली गई मूर्खतापूर्ण और सांप्रदायिक समानता. और फिर मॉडल्स द्वारा पहने हुए कपड़ों पर सूर्या की विचित्र टिप्पणी कि वे पारंपरिक हिंदू पोशाक नहीं हैं. गौरतलब है कि विज्ञापन में तीन महिलाएं साड़ी और एक सलवार कमीज पहने हैं, जबकि पुरुष ने कुर्ता-पायजामा पहना है.
जिस अंग्रेजी भाषा में सूर्या ने ट्वीट किया था, उस भाषा के विपरीत उर्दू भारत की आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है, जो वास्तव में ‘भारतीय मूल’ की एक भाषा है. उर्दू बॉलीवुड का अभिन्न अंग है, हालांकि इसके शब्दों का उच्चारण हमेशा सही ढंग से नहीं किया जाता है.
गौर करने वाली बात यह भी है कि मुगलों ने दिवाली की व्याख्या करने के लिए ‘दीपों के त्योहार’ या जश्न–ए-चराग़ां का इस्तेमाल किया था.
गौरतलब है कि कम से कम सलवार-कमीज़ और कुर्ता के संभवत: ‘गैर-भारतीय’ ऐतिहासिक उत्पत्ति अच्छी तरह से जगजाहिर है. जबकि आधुनिक कपड़ों की धार्मिक पहचान वाले विचार को हम में से अधिकांश लोग हास्यास्पद, अतार्किक और घृणास्पद मानते होंगे (संभव है कि नरेंद्र मोदी इससे सहमत न हों).
इसी दौरान एक और जानी-पहचानी ऑनलाइन हिंदुत्व एक्टिविस्ट ने महिलाओं द्वारा बिंदी न लगाने पर आपत्ति जताई और कहा कि जो लोग दिवाली को ‘प्रेम और रोशनी के त्योहार’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वे इसका ‘गैर-हिंदूकरण’ करने के दोषी हैं. मेरा सुझाव है कि वे अपना निशाना प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर साधें, जिसे दिवाली को ‘रोशनी का त्योहार’ बताने में कोई समस्या नहीं है. भारतीय दूतावास स्पेनिश भाषी देशों में दिवाली को नियमित तौर पर ‘फेस्टिवल दे लास लूसेस’ कहता है. अब शायद भाजपा उन्हें इस संबंध में कोई ज्ञापन भेजे.
इस विज्ञापन को वापस लेने के फैब इंडिया के फ़ौरन लिएफैसले से मैं दुखी हूं लेकिन हैरान नहीं हूं. उसका यह दावा भी कि ‘जश्न-ए-रिवाज़’ वाक्यांश दिवाली के लिए नहीं था, एक बहाने जैसा लगता है. लेकिन तथ्य यही है कि बड़े-बड़े भारतीय ब्रांड और कंपनियां हिंदुत्व की कट्टरता के सामने घुटने टेक चुके हैं.
पिछले साल टाटा समूह के स्वामित्व वाले तनिष्क को एक बेहद सुंदर विज्ञापन वापस लेन पड़ा था, जिसमें विभिन्न धर्म, समुदाय और संस्कृतियों के समावेश वाला घर-परिवार दिखाया गया था. दूसरी ओर, सर्फ एक्सेल को दिल को छू लेने वाले एक होली के विज्ञापन को लेकर भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. इस विज्ञापन में एक मुस्लिम लड़के और हिंदू लड़की को दिखाया गया था. लेकिन सर्फ एक्सेल ने उस दवाब का प्रतिरोध किया, शायद इसलिए क्योंकि इस पर नियंत्रण रखने वाली मूल कंपनी, एचयूएल एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है.
फैब इंडिया और तनिष्क ने झुकना चुना, वो इसलिए नहीं क्योंकि उनके विज्ञापन खराब थे या उन्हें अपने ग्राहकों के दूर हो जाने का डर था, बल्कि उन्होंने झुकना इसलिए चुना क्योंकि वे जानते हैं कि भारत क़ानून से चलने वाला देश नहीं है. वे जानते हैं कि सरकार समर्थक कार्यकर्ता आसानी से उनके प्रतिष्ठानों और कर्मचारियों के खिलाफ बल और हिंसा का प्रयोग कर सकते हैं और पुलिस उन्हें वो सारी छूट देगी जिसकी उन्हें जरूरत होगी.
वे जानते हैं कि हिंदुत्व की विचारधारा के विपरीत जाने का मतलब विभिन्न तरीकों से निशाना बनाया जाना हो सकता है. ‘भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ के लिए पुलिस मुकदमा दर्ज कर सकती है, इनकम टैक्स की छापेमारी हो सकती है, प्रवर्तन निदेशालय कुछ ओछी और आधारहीन पुरानी शिकायतों को कुरेदकर समन जारी कर सकता है. फिर कंपनी और इसके मालिक अदालत दर अदालत जूझते हुए सालों खराब कर सकते हैं.
इसलिए, भले ही फैब इंडिया और उस जैसे अन्यों की कायर होने के लिए आलोचना करने का मन करता हो, फिर भी हमें हमारे गुस्से को किसी और दिशा में निकालने की जरूरत है. कहीं और से मेरा मतलब केवल सूर्या और दूसरे हिंदुत्व के ट्रोल्स से नहीं है बल्कि भाजपा और आरएसएस के राजनीतिक नेतृत्व से है, जो इन पिछले कुछ वर्षों से देश के हिंदुओं के मन में यह बात बैठाने के लिए कि- वे और उनका धर्म खतरे में हैं, वह सब कुछ कर रहा है जो कर सकता है.
हिंदुत्व की प्रोपेगेंडा मशीन पहले ही हमारा परिचय ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘यूपीएससी जिहाद’ और ‘वेंडर जिहाद’ से करा चुकी है और अब उन्होंने ‘विज्ञापन जिहाद’ खोज लिया है. इसका मकसद हिंदुओं को असुरक्षित महसूस कराना और उनके और भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच नफरत पैदा करना है.
सूर्या आसानी से एक उर्दू वाक्य को निशाना बनाने में सक्षम थे क्योंकि पिछले महीने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी यही किया था, और फिर प्रधानमंत्री मोदी से उन्हें उनके ‘कुशल शासन’ के लिए प्रशंसा भी मिली थी.
भाजपा द्वारा पैदा की गई इस भ्रष्ट, दूषित और विकृत राजनीतिक श्रृंखला में एक नेता जितना अधिक मुसलमानों, इस्लाम और ‘अब्राहम’ धर्मों को निशाना बनाएगा, उतनी ही तेजी से उसका ओहदा बढ़ेगा. यही वो बीमारी है जिसका भारत को डटकर मुकाबला करने की जरूरत है.

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