नौजवान राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की नारेबाजी के चक्कर में न पड़ें.- सुशील गुप्ता
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भारतीय जनता पार्टी के नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध लोग उसे राष्ट्रवाद के नाम पर कुर्बान हो जानेवाला नौजवान बतला रहे थे.

वक्त गुजरता गया और चंदन गुप्ता का उपयोग संभवतः राष्ट्रवादी राजनीति के लिए घटता चला गया

नौजवान  राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की नारेबाजी के चक्कर में न पड़ें.- सुशील गुप्ता

कासगंज पुलिस मालूम नहीं कर पाई कि चंदन की मौत कैसे हुई.,क्या चंदन गुप्ता हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का शिकार हुआ?

BY अपूर्वानंद

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‘अब नौजवानों को मेरी सलाह है कि वे राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की नारेबाजी के चक्कर में न पड़ें.’ यह मशविरा लखनऊ में एक पत्रकार सम्मेलन में सुशील गुप्ता ने भारत के नौजवानों को, हिंदू युवकों और युवतियों को दिया. वे हिंदी में ही बोल रहे थे लेकिन हिंदी अख़बारों ने हिंदी टेलीविज़न चैनलों ने एक पिता की इस सलाह या चेतावनी को हिंदी पढ़ने वाले युवावर्ग तक पहुंचाना आवश्यक नहीं समझा.

लेकिन क्या आपको सुशील गुप्ता नाम की याद है? कासगंज वाले सुशील गुप्ता की? तीन साल पहले कासगंज खबरों में था. और आज फिर है. दूसरी वजह से.

या शायद तीन वर्ष पहले जो हुआ और अभी अल्ताफ़ के साथ पुलिस की हिरासत में जो किया गया, उसमें कोई रिश्ता है! हमने तीन साल पहले की ‘घटना’ को भुला दिया. शायद इसीलिए अल्ताफ़ की ‘मौत’ हुई. लेकिन हम सुशील गुप्ता पर लौट आएं.
सुशील गुप्ता उत्तर प्रदेश में कासगंज के रहने वाले हैं. वे अपने बेटे की वजह से खबर में आए. ठीक यह होगा कहना कि अपने बेटे की मौत की वजह से. वह साधारण मौत न थी. किसी बंदूक, रिवाल्वर की गोली से हुई मौत थी.

चंदन गुप्ता उनका बेटा था. वह 26 जनवरी 2018 को मारा गया था. उसकी मौत गोली से हुई लेकिन वह शिकार हुआ था राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का. यही आज तक़रीबन चार साल गुज़र जाने के बाद उसके पिता सुशील गुप्ता सबको बताना चाहते हैं.

तीन वर्ष पहले चंदन गुप्ता खबरों में थे. हिंदी अखबार, चैनल उसे शहीद का दर्जा देने में एक दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे थे. भारतीय जनता पार्टी की एक नेता उसकी मौत को लाला लाजपत राय की मौत के समान ठहरा रही थीं. भारतीय जनता पार्टी के नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध लोग उसे राष्ट्रवाद के नाम पर कुर्बान हो जानेवाला नौजवान बतला रहे थे.

वक्त गुजरता गया और चंदन गुप्ता का उपयोग संभवतः राष्ट्रवादी राजनीति के लिए घटता चला गया. क्या इसी से दुखी होकर अपनी शिकायत लेकर चंदन के पिता उसकी माता के साथ लखनऊ पहुंचे हैं?

हम याद कर लें कि चंदन गुप्ता की मौत क्यों और किन परिस्थितियों में हुई. 26 जनवरी, 2018 को कासगंज में कुछ नौजवानों ने तिरंगा यात्रा निकाली. तकरीबन 100 मोटरसाइकिलें कासगंज के मुसलमान बहुल मोहल्ले में पहुंचीं और सवार ज़िद करने लगे कि उन्हें रास्ता दिया जाए.

उस चौक पर, जिसका नाम अब्दुल हमीद चौक है, मोहल्लावासी खुद तिरंगा झंडा फहराने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने कहा कि सारी कुर्सियां आदि को हटाना संभव नहीं और इतनी मोटरसाइकिलों के लिए रास्ता बनाना मुमकिन न होगा. इस पर मोटरसाइकिल सवारों और मोहल्लावासियों के बीच कहासुनी और झड़प हुई.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, मोहल्लेवासियों ने उसने कहा कि वे उनके झंडोत्तोलन के कार्यक्रम में शरीक हों. उनके अनुसार वे कहने लगे कि वे वहां भगवा भी लहराएंगे. इसके लिए मोहल्लेवालों का तैयार होना मुमकिन न था. बात बढ़ी और झड़प तेज हुई. तिरंगा यात्रा के लोग अपनी मोटरसाइकिलें लेकर दूसरी दिशाओं में भागे और कई ने अपनी मोटरसाइकिलें वहां छोड़ दीं. बाद में पुलिस ने उन्हें जब्त किया.

एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, हथियार लिए हुए लोग मुसलमान मोहल्ले की तरफ बढ़ते दिखाई दे रहे थे. अब्दुल हमीद चौक से निकलकर तिरंगा यात्रा में शामिल जवानों ने जमकर तोड़फोड़ , पत्थरबाजी की. इस बीच गोलियां चलीं और उस गोलीबारी में चंदन गुप्ता मारे गए.

जैसा हमने पहले कहा, तकरीबन चार साल गुजर जाने के बाद भी कासगंज पुलिस यह ठीक ठीक मालूम नहीं कर पाई कि चंदन की मौत कैसे हुई. गोली किस बंदूक या हथियार की थी. चूंकि मारे जाने वाले का नाम चंदन था, मारने वाला मुसलमान होगा, इस सिद्धांत पर पुलिस ने एक मुसलमान को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि इसका कोई सबूत नहीं कि उसने गोली चलाई थी.

किसी की रुचि इसमें नहीं कि वह मौत कैसे हुई. हो सकता है कारण मालूम होने पर उसका गौरव न रह जाए. लेकिन एक समाज के तौर पर चिंता होनी चाहिए कि न तो हमारी पुलिस, न हम हिंसा का कारण खोजने, उसके स्रोत की तलाश करने में समय लगाते हैं. हम मात्र एक धारणा रखते हैं.

अभी हमारा मकसद उस घटना की तहकीकात नहीं है. हमारी दिलचस्पी चंदन गुप्ता और उसके परिवार में है. चंदन के मित्रों ने और परिवार ने भी बताया कि वह किसी पार्टी का या संघ के किसी संगठन का सदस्य न था. वह स्नातक की पढ़ाई कर रहा था और संकल्प नामक संस्था चलाता था.

एक साल पहले बनी इस संस्था के एक दूसरे सदस्य ने बतलाया कि इस तिरंगा यात्रा के निर्णय की खबर उसे पिछली रात को मिली थी. लेकिन उसे पहले से हिंसा की आशंका थी और कम से कम पांच दिन पहले उसने सार्वजानिक तौर पर सबको इससे अवगत करा दिया था.

चंदन में सामाजिकता का रुझान था. परिवार भाजपा का समर्थक, खुद को राष्ट्रवादी मानने वाला था, आज तक मानता है. बेटा इस विचार से प्रभावित हुआ होगा और तिरंगा यात्रा को राष्ट्रवादी कर्तव्य मानकर उसमें शरीक हुआ होगा. उसे इसका अंदाज़ा न होगा कि इसकी परिणति क्या हो सकती है.
उस यात्रा में हिंसा की तैयारी थी, क्या उसे पता था? पिता और परिवार को भी यह राष्ट्रवादी कार्य जान पड़ा होगा. बेटे की सामाजिकता की तुष्टि और अभिव्यक्ति इस राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी अभियान में हुई जिसने उसकी जान ली.

मुसलमान मोहल्ले से होकर ही तिरंगा गुजरे तो उसका माहातम्य होगा, ऐसा चंदन को भी लगा होगा. इसके पीछे शायद यह पवित्र विचार रहा हो कि ऐसा करके वह एक कमतर राष्ट्रीय जगह को राष्ट्रवादी रंग में रंग देगा. या यह कि मुसलमान मोहल्ला एक आतंरिक शत्रु प्रदेश है, तिरंगे के सहारे जिस पर विजय प्राप्त करना ही कर्तव्य है. अभी चंदन ने अपना सार्वजनिक जीवन शुरू ही किया था कि उसका अंत हो गया.

जैसा पहले लिखा है, भाजपा और उससे जुड़े संगठनों ने तब चंदन की खूब जय-जयकार की. चंदन के पिता ने उसे शहीद का दर्जा देने की मांग की. उसके परिवार को मुआवजे के साथ शहर के एक चौक का नाम चंदन के नाम पर करने की घोषणा की गई.

उस वक्त की उत्तेजना के गुजर जाने के बाद हमने चंदन के पिता को कई बार यह शिकायत करते सुना कि भाजपा सरकार ने उनके साथ धोखा किया है. बेटे को शहीद की पदवी न मिलने से भी वे ख़फ़ा थे. उनको किसी ने क़ायदे से नहीं बताया कि शहीद सरकारी पदवी नहीं होती है.

अगले साल गणतंत्र दिवस पर परिवार ने अपने ख़र्चे पर शहर में कई जगहों पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के साथ चंदन की तस्वीरों वाले बैनर लगवाए. इसका खर्च और इंतजाम उन्हीं को करना पड़ा. खबर छपी कि उनके घर पर 30 फ़ीट ऊंचा ध्वज लहराया गया. आखिर वह एक हिंदू शहीद का घर था! परिवार तिरंगा यात्रा भी निकालना चाहता था, पुलिस ने इजाजत न दी.

यह खबर भी साथ छपी कि अब्दुल हमीद चौक पर मुसलमानों को भी तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं मिली. उनका क्या कसूर था कि उन्हें राष्ट्र ध्वज फहराने से रोक दिया गया, मोहल्लेवालों के इस सवाल का कोई उत्तर प्रशासन के पास न था. उन्होंने तो पिछले साल हिंसा नहीं की थी. उनके चौक पर चंदन और उनके साथी जबरदस्ती करने आए थे.

इस बात के तीन साल से ज़्यादा गुजर चुके हैं. आज चंदन के पिता अपने परिवार के साथ इस राजनीति से ठगे हुए प्रतीत हो रहे हैं और वही वे दुनिया को बताना चाहते हैं. पिछले साल जामिया मिलिया इस्लामिया में आंदोलनरत छात्रों पर उनके मारे गए बेटे से भी कम उम्र के एक दूसरे जवान ने गोली चलाने की कोशिश की और बाद में उसे चंदन के नाम पर उचित ठहराने का प्रयास किया गया.

उस समय चंदन के पिता ने इस हिंसा की आलोचना की थी. आज वह गोलीबाज हिंदुत्व का उभरता हुआ सितारा है. उसके अनेक अनुयायी भी बन चुके हैं. उसका परिवार उसके बारे में क्या सोचता है? चंदन अगर जीवित होता तो ऐसा ही उसके साथ भी हो सकता था?

आज चंदन के पिता कह रहे हैं कि नौजवानों को उस रास्ते नहीं जाना चाहिए जिस पर हिंदुत्ववादी या राष्ट्रवादी उत्साह या उन्माद में उनका बेटा चल पड़ा था. उन्होंने एक साथ इन दोनों शब्दों का प्रयोग किया है.
क्या उनकी नाराज़गी की वजह यह है कि वे इस मौत के बाद या उसके बदले जो चाहते थे, वह नहीं मिला?  या वे इसके ख़तरे को समझ पाए हैं? यह किसी पत्रकार ने उनसे पूछा हो, यह रिपोर्ट से जान नहीं पड़ता. लेकिन यह ऐसा प्रश्न है जिस पर उनसे और उनके परिवारजनों से बातचीत बहुत आवश्यक है.

क्या शिकायत सिर्फ यही है कि नेता या राजनीतिक दल चंदन जैसे जवानों का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें भूल जाते हैं? या राष्ट्रवाद और हिंदुत्ववादी इस राजनीति में ही कोई बुराई है?

जब सुशील गुप्ता कहते हैं कि वे इस राजनीति के समर्थक हैं लेकिन नौजवानों को इस राजनीति के वाग्जाल में फंसने देना नहीं चाहते तो क्या अपनी बात का विरोधाभास समझ पा रहे हैं? अगर इस राजनीति का पुरस्कार मिले तो क्या ये वरेण्य है? क्या इसके ख़तरे के कारण वे इसे ग़लत मानते हैं?

चंदन जैसे जवानों के इस रास्ते पर जाने के कारणों का अध्ययन नहीं किया गया है. जो इस रास्ते से हट जाते हैं, उनका भी नहीं. यह राष्ट्रवाद वास्तव में हिंसा का रास्ता है. मुसलमान और ईसाई विरोधी घृणा इसका आधार है. यह कबसे और कैसे उन्हें आकर्षित करने लगता है? शिक्षा कहां से मिलती है?

क्या सुशील गुप्ता यह खुद से कभी पूछ पाएंगे कि जिस हिंदुत्व की राजनीति के वे अब तक समर्थक हैं, वही तो उनके बेटे को ले गई. उसी की वह तार्किक परिणति है? अगर उस रोज़ वह लौट आता तो निश्चय ही वे इस पर विचार नहीं करते.

उनका बेटा हिंदुत्व के प्रभुत्व की स्थापना करने तिरंगे के आवरण में निकला था. वह उसमें शहीद हुआ, ये वे अब तक मानते हैं. फिर अफ़सोस क्या मात्र इस बात का है कि इसकी पर्याप्त स्वीकृति नहीं मिली?
प्रश्न सिर्फ उनका नहीं है. चंदन जैसे बहुत से किशोर और युवक इस हिंसक रास्ते पर दौड़ रहे हैं. अभी लिखते हुए ही किसी का भेजा वीडियो देखा. कई नौजवान भगवा झंडे और तलवारें लिए स्कूटर दौड़ा रहे हैं. ये किन पर हथियारों से चढ़ाई करने जा रहे हैं?  दौड़ते स्कूटर पर एक हाथ में तलवार लिए दूसरे हाथ से अपनी तस्वीर खींचता नौजवान जिस आत्ममुग्ध,आत्मग्रस्त और हिंसक हिंदुत्ववाद के रास्ते चल पड़ा है , उसके बारे में सुशील गुप्ता की चेतावनी वह कैसे सुनेगा अगर वे अब तक उसके समर्थक हैं?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

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