अदालतों के हस्तक्षेप से इस देश के छात्रों को लोन मिलेंगे तो कैसे बनेगा नया इंडिया?
अदालतों के हस्तक्षेप से इस देश के छात्रों को लोन मिलेंगे तो कैसे बनेगा नया इंडिया?
अदालतों के हस्तक्षेप से इस देश के छात्रों को लोन मिलेंगे तो कैसे बनेगा नया इंडिया?
by नीरज पाण्डेय की स्टोरी
अदालतों के हस्तक्षेप से इस देश के छात्रों को लोन मिलेंगे तो कैसे बनेगा नया इंडिया?
अगर विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी भारत के बैंकों को 22,585.83 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो एजुकेशन लोन में ‘बच्चा’ समझकर ही सही जोखिम तो उठाया ही जा सकता है.
महीने में 15 से 20 हज़ार रुपये कमाने वाले राजेश कुमार को शक है कि उत्तर प्रदेश सरकार की नई जनसंख्या नीति से समाज में तरक्की आएगी. राजेश हर रोज़ मुझे अपनी टैक्सी से ऑफिस तक छोड़ते हैं. कम पढ़े-लिखे हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं और नीतियों को लेकर जागरूक हैं. मैंने जनसंख्या नीति पर उनके संदेह की वजह पूछी तो कहने लगे- ‘आशंका नीयत को लेकर है’.
दरअसल राजेश की दो बेटियां हैं. उन्होंने दोनों बच्चियों का दाखिला गाजियाबाद के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में करा रखा है. राजेश की जो आमदनी है, उसमें दो-दो बेटियों को इंजीनियरिंग पढ़ाना असंभव है. ज़ाहिर है, उन्हें एजुकेशन लोन लेना पड़ा, लेकिन इस लोन के लिए उन्हें जो भगीरथ प्रयास करने पड़े वो वाकई सिस्टम की नीयत और कमज़ोर आर्थिक वर्ग के छात्रों की नियति पर सवाल खड़े करते हैं. राजेश जब एजुकेशन लोन के लिए पहली बार बैंक में गए और बैंक वालों को पता चला कि इनकी आय का कोई नियमित साधन नहीं है तो बैंक कर्मी ने राजेश की ओर ऐसे देखा ‘जैसे लोन नहीं बैंकवाले से उसकी किडनी मांग ली हो’. खैर, उन्हें एजुकेशन लोन के लिए जो लंबा संघर्ष करना पड़ा, उसे यहां समेटना संभव नहीं है. लेकिन, राजेश की पूरी चिंता सिर्फ 2 प्वाइंट में समझिए. पहली चिंता- जनसंख्या पर नियंत्रण का तरीका कानून नहीं, बल्कि जागरूकता है, जबकि सरकार इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है. दूसरी चिंता- इंसान को जागरूक करने का सबसे बड़ा जरिया शिक्षा है, सरकार को सबके लिए शिक्षा सुलभ बनाने पर ज़ोर देना चाहिए, बाकी चीजें अपने आप सुधर जाएंगी. यानी राजेश चाहते हैं कि सरकारें नई-नई नीतियां लॉन्च करने के बदले पहले से जारी पॉलिसी को ही लागू करने में अच्छी नीयत का प्रदर्शन करें.
गाइडलाइन है लेकिन बैंक वाले विवेक का इस्तेमाल नहीं करते!
अब असली ख़बर पर आते हैं. पिछले दिनों केरल हाई कोर्ट ने बैंक ऑफ इंडिया से कहा कि वो माता-पिता की आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए किसी छात्र को एजुकेशन लोन देने से मना नहीं कर सकता है. BAMS की एक छात्रा देविका सोनीराज ने 7.50 लाख रुपये के एजुकेशन लोन के लिए बैंक में आवेदन दिया तो बैंक ने इसे रिेजेक्ट कर दिया. देविका से कहा गया कि बैंक को उनके पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं लगती कि वो लोन चुका पाएंगे. कमज़ोर आर्थिक वर्ग के छात्रों को एजुकेशन लोन देने से मना करने की ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं. (ज़ाहिर है इस वक्त आपको विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी बहुत याद आ रहे होंगे. खुद प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले दिनों बताया कि इन भगोड़ों ने जो फ़र्ज़ीवाड़ा किया उसके चलते बैंकों को कुल मिलाकर 22,585.83 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ).
ये तब है जबकि 28 अप्रैल 2001 को (जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे और यशवंत सिन्हा के पास वित्त मंत्रालय था) रिज़र्व बैंक ने एक नोटिफिकेशन जारी करके कहा था कि कोई भी योग्य छात्र आर्थिक मदद के अभाव में उच्च शिक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए. एजुकेशन लोन स्कीम पर बैंको को जारी अधिसूचना में रिज़र्व बैंक ने जो जानकारी दी थी, वो अपने आप में सबकुछ कह जाती है- ’13 जून 2000 को वित्त मंत्री ने पब्लिक सेक्टर बैंकों के प्रमुखों के साथ मीटिंग की, जिसमें गरीब लेकिन मेधावी छात्रों की उच्च शिक्षा में बैंकों की भूमिका पर चर्चा हुई. इसके बाद इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) ने एक स्टडी ग्रुप का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता केनरा बैंक के प्रबंध निदेशक आरजे कामथ ने की. इस स्टडी ग्रुप की सिफारिशों के आधार पर एक समग्र शैक्षिक लोन स्कीम तैयार की गई है, जिसका लक्ष्य है कि योग्य छात्रों को उच्च शिक्षा मुहैया कराने में वित्तीय मदद मुहैया कराई जाए’.
कोर्ट को बार-बार क्यों याद दिलाना पड़ता है कर्तव्य क्या है?
अगस्त 2015 में (जब अरुण जेटली मोदी सरकार में वित्त मंत्री थे) IBA ने एजुकेशन लोन पर संशोधित गाइडलान जारी की और इसे ज्यादा स्पष्ट बनाया. एसोसिएशन ने कहा कि ‘कर्ज़ लेने वाले छात्र का कोई क्रेडिट इतिहास नहीं होता है, उसे दिया जा रहा लोन भविष्य का लोन होता है. अगर किसी छात्र के माता-पिता की क्रेडिट रेटिंग अच्छी नहीं है, तो ऐसे मामलों में बैंक एक समझदारी भरा कदम उठाकर ज्वाइंट आवेदकों को कर्ज़ दे सकता है.’
लोन स्कीम को रिवाइज़ करने का मतलब ही था कि बैंक इसका ईमानदारी के साथ पालन नहीं कर रहे थे. यही वजह है कि आज़ादी के पूर्व गठित 247 बैंकिंग कंपनियों के संगठन IBA को दबाव में आकर एजुकेशन लोन की पॉलिसी को और स्पष्ट करना पड़ा. लेकिन, 2015 के बाद 7 वर्ष गुज़र गए. ज़रूरतमंद छात्रों के लिए ‘कमाने के बाद चुकाने’ का ये विकल्प आसान नहीं हुआ. अगर ऐसा होता तो आए दिन एजुकेशन लोन दिलाने के लिए अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता.
जिनके पास पैसे नहीं हैं, उन्हें शिक्षा का अधिकार नहीं देंगे?
केरल का ही एक और उदाहरण देखिए. जुलाई 2020 में केरल के कोल्लम में एक छात्र का एजुकेशन लोन बैंक ने इसलिए रिजेक्ट कर दिया क्योंकि उसके पिता का CIBIL स्कोर (3 अंकों का वो नंबर जो 300 से 900 के बीच होता है और इसके आधार पर कर्ज़ लेने की पात्रता मापी जाती है) संतोषजनक नहीं था. इस मामले में 20 वर्ष के छात्र प्रणव ने 5 लाख 75 हज़ार के लोन के लिए आवेदन किया था. बैंक को पता चला कि प्रणव के पिता का CIBIL स्कोर कम है क्योंकि वो एक वाहन की मासिक किस्त समय पर नहीं जमा कर पाए थे. परिवार इस बात से भी आहत था कि बैंक ने उनके साथ ख़राब बर्ताव किया. बैंक के मैनेजर ने प्रणव की मां से कहा कि ‘बच्चों को तभी पढ़ाओ जब पास में पैसे हों’. इतना ही नहीं, ‘बैंक वाले ने आवेदन स्वीकार तक करने से मना कर दिया.’ इस मामले में भी केरल हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रणव को लोन मिल गया. लेकिन, सवाल उठता है कि ऐसी समस्याएं कहां जाकर खत्म होंगी.
वर्ष 2015 में सरकार केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और IBA ने मिलकर विद्या लक्ष्मी पोर्टल भी लांच किया. (आप इस लिंक से पोर्टल पर पहुंच सकते हैं- https://www.vidyalakshmi.co.in) मकसद ये था कि छात्र इस पोर्टल के जरिये एक ही जगह कई बैंकों में लोन के लिए आवेदन कर सकेंगे. लेकिन इस पोर्टल पर भी छात्रों की आम तौर पर ये शिकायत होती है कि उनके एप्लीकेशन का स्टैटस नहीं बताया जाता.
टोकरी का एक सेब ख़राब है, सारे फलों को सज़ा क्यों?
सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि एजुकेशन लोन को रिकवर करना भी कई बार बैंकों के लिए आसान नहीं होता. अमेरिका में दूसरा सबसे बड़ा लोन स्टूडेंट लोन ही होता है, जिसमें 10 प्रतिशत से ज्यादा बाद में NPA यानी फंसा हुआ कर्ज़ साबित हो जाता है. इसी तरह भारत में भी छात्रों को दिए जाने वाले 10 में से 1 लोन को राइट ऑफ करना पड़ता है यानी लोन वसूली की सारी उम्मीदें खत्म हो जाने के बाद इसे बट्टे खाते में डाल दिया जाता है. लेकिन जैसा कि हमने पहले ही कहा अगर विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी भारत के बैंकों को 22,585.83 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो एजुकेशन लोन में ‘बच्चा’ समझकर ही सही (?) जोखिम तो उठाया ही जा सकता है. संविधान प्रदत्त शिक्षा और समानता का मौलिक अधिकार अक्षुण्ण रखने के लिए और भारत के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए लोक कल्याणकारी सरकारें फलों की टोकरी में एक सेब ख़राब होने का ख़तरा मोल लें तो ये घाटे का सौदा नहीं है.

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